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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,566 pages

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‘महामुने! वरुणने मेरा गला पकड़कर ढकेल दिया है। वे आपकी पत्नीको नहीं दे रहे हैं, अब आपको जो कुछ करना हो, वह कीजिये’ ।। २२ ।। नारदस्य वचः श्रुत्वा क्रुद्धः प्राज्वलदङ्गिराः । अपिबत् तेजसा वारि विष्टभ्य सुमहातपाः ।। २३ ।। ‘नारदजीकी बात सुनकर अंगिराके पुत्र उतथ्य क्रोधसे जल उठे। वे महान् तपस्वी तो थे ही, अपने तेजसे सारे जलको स्तम्भित करके पीने लगे ।। २३ ।। पीयमाने तु सर्वस्मिंस्तोयेऽपि सलिलेश्वरः । सुहृद्भिर्भिक्षमाणोऽपि नैवामुञ्चत तां तदा ।। २४ ।। ‘जब सारा जल पीया जाने लगा, तब सुहृदोंने जलेश्वर वरुणसे प्रार्थना की तो भी वे भद्राको न छोड़ सके ।। २४ ।। तत क्रुद्धोऽब्रवीद् भूमिमुतथ्यो ब्राह्मणोत्तमः । दर्शयस्व स्थलं भद्रे षट्सहस्रशतह्रदम् ।। २५ ।। ‘तब ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ उतथ्यने कुपित होकर पृथ्वीसे कहा—‘भद्रे! तू मुझे वह स्थान दिखा दे, जहाँ छः हजार बिजलियोंका प्रकाश छाया हुआ है’ ।। २५ ।। ततस्तदीरिणं जातं समुद्रस्यावसर्पतः । तस्माद् देशान्नदीं चैव प्रोवाचासौ द्विजोत्तमः ।। २६ ।। अदृश्या गच्छ भीरु त्वं सरस्वति मरुन् प्रति । अपुण्य एष भवतु देशस्त्यक्तस्त्वया शुभे ।। २७ ।। ‘समुद्रके सूखने या खिसक जानेसे वहाँका सारा स्थान ऊसर हो गया। उस देशसे होकर बहनेवाली सरस्वती नदीसे द्विजश्रेष्ठ उतथ्यने कहा—‘भीरु सरस्वति! तुम अदृश्य होकर मरु प्रदेशमें चली जाओ। शुभे! तुम्हारे द्वारा परित्यक्त होकर यह देश अपवित्र हो जाय’ ।। २६-२७ ।। तस्मिन् संशोषिते देशे भद्रामादाय वारिपः । अददाच्छरणं गत्वा भार्यामाङ्गिरसाय वै ।। २८ ।। ‘जब वह सारा प्रदेश सूख गया, तब जलेश्वर वरुण भद्राको साथ लेकर मुनिकी शरणमें आये और उन्होंने आंगिरसको उनकी भार्या दे दी ।। २८ ।। प्रतिगृह्य तु तां भार्यामुतथ्यः सुमनाऽभवत् । मुमोच च जगद् दुःखाद् वरुणं चैव हैहय ।। २९ ।। ‘हैहयराज! अपनी उस पत्नीको पाकर उतथ्य बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने सम्पूर्ण जगत् तथा वरुणको जलके कष्टसे मुक्त कर दिया ।। २९ ।। ततः स लब्ध्वा तां भार्यां वरुणं प्राह धर्मवित् । उतथ्यः सुमहातेजा यत् तच्छृणु नराधिप ।। ३० ।।