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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,566 pages

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Page 1480

‘नरेश्वर! अपनी उस पत्नीको पाकर महातेजस्वी धर्मज्ञ उतथ्यने वरुणसे जो कुछ कहा, वह सुनो ॥ ३० ॥ मयैषा तपसा प्राप्ता क्रोशतस्ते जलाधिप । इत्युक्त्वा तामुपादाय स्वमेव भवनं ययौ ॥ ३१ ॥ ‘जलेश्वर! तुम्हारे चिल्लानेपर भी मैंने तपोबलसे अपनी इस पत्नीको प्राप्त कर लिया।’ ऐसा कहकर वे भद्राको साथ ले अपने घरको लौट गये ॥ ३१ ॥ एष राजन्नीदृशो वै उतथ्यो ब्राह्मणर्षभः । ब्रवीम्यहं ब्रूहि वा त्वमुतथ्यात् क्षत्रियं वरम् ॥ ३२ ॥ ‘राजन्! ये ब्राह्मणशिरोमणि उतथ्य ऐसे प्रभावशाली हैं। यह बात मैं कहता हूँ। यदि उतथ्यसे श्रेष्ठ कोई क्षत्रिय हो तो तुम उसे बताओ’ ॥ ३२ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पवनार्जुनसंवादो नाम चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें वायु देवता तथा कार्तवीर्य अर्जुनका संवादनामक एक सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५४ ॥


* कुछ लोग ‘षट्सहस्रशतह्रदम्’ का अर्थ यों करते हैं—वहाँ छः लाख तालाब शोभा पा रहे थे; परंतु ‘शतह्रदा’ शब्द बिजलीका वाचक है; अतः उपर्युक्त अर्थ किया गया है।