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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,566 pages

Page 1549 of 2566

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Page 1549

'राजन्! नरश्रेष्ठ! अब कुरुराज युधिष्ठिर प्रकृतिस्थ (शान्त और संदेहरहित) हो चुके हैं और अपना अनुसरण करनेवाले समस्त भाइयों, राजाओं तथा बुद्धिमान् श्रीकृष्णके साथ आपकी सेवामें बैठे हैं। अब आप इन्हें हस्तिनापुरमें जानेकी आज्ञा दीजिये' ।। ६-७ ।।

एवमुक्तो भगवता व्यासेन पृथिवीपतिः ।
युधिष्ठिरं सहामात्यमनुजज्ञे नदीसुतः ।। ८ ।।
भगवान् व्यासके ऐसा कहनेपर पृथ्वीपालक गंगापुत्र भीष्मने मन्त्रियोंसहित राजा युधिष्ठिरको जानेकी आज्ञा दी ।। ८ ।।

उवाच चैनं मधुरं नृपं शान्तनवो नृपः ।
प्रविशस्व पुरीं राजन् व्येतु ते मानसो ज्वरः ।। ९ ।।
उस समय शान्तनुकुमार भीष्मने मधुर वाणीमें राजासे इस प्रकार कहा—'राजन्! अब तुम पुरीमें प्रवेश करो और तुम्हारे मनकी सारी चिन्ता दूर हो जाय ।। ९ ।।

यजस्व विविधैर्यज्ञैर्बह्वन्नैः स्वाप्तदक्षिणैः ।
ययातिरिव राजेन्द्र श्रद्धादमपुरःसरः ।। १० ।।
'राजेन्द्र! तुम राजा ययातिकी भाँति श्रद्धा और इन्द्रिय-संयमपूर्वक बहुत-से अन्न और पर्याप्त दक्षिणाओंसे युक्त भाँति-भाँतिके यज्ञोंद्वारा यजन करो ।। १० ।।

क्षत्रधर्मरतः पार्थ पितॄन् देवांश्च तर्पय ।
श्रेयसा योक्ष्यसे चैव व्येतु ते मानसो ज्वरः ।। ११ ।।
'पार्थ! क्षत्रियधर्ममें तत्पर रहकर देवताओं और पितरोंको तृप्त करो। तुम अवश्य कल्याणके भागी होओगे; अतः तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये ।। ११ ।।

रञ्जयस्व प्रजाः सर्वाः प्रकृतीः परिसान्त्वय ।
सुहृदः फलसत्कारैरर्चयस्व यथार्हतः ।। १२ ।।
'समस्त प्रजाओंको प्रसन्न रखो। मन्त्री आदि प्रकृतियोंको सान्त्वना दो। सुहृदोंका फल और सत्कारोंद्वारा यथायोग्य सम्मान करते रहो ।। १२ ।।

अनु त्वां तात जीवन्तु मित्राणि सुहृदस्तथा ।
चैत्यस्थाने स्थितं वृक्षं फलवन्तमिव द्विजाः ।। १३ ।।
'तात! जैसे मन्दिरके आस-पासके फले हुए वृक्षपर बहुत-से पक्षी आकर बसेरे लेते हैं, उसी प्रकार तुम्हारे मित्र और हितैषी तुम्हारे आश्रयमें रहकर जीवन-निर्वाह करें ।। १३ ।।

आगन्तव्यं च भवता समये मम पार्थिव ।
विनिवृत्ते दिनकरे प्रवृत्ते चोत्तरायणे ।। १४ ।।
'पृथ्वीनाथ! जब सूर्यनारायण दक्षिणायनसे निवृत्त हो उत्तरायणपर आ जायँ, उस समय तुम फिर हमारे पास आना' ।। १४ ।।

तथेत्युक्त्वा च कौन्तेयः सोऽभिवाद्य पितामहम् ।
प्रययौ सपरीवारो नगरं नागसाह्वयम् ।। १५ ।।