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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,566 pages

Page 1615 of 2566

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मैं चाहूँ तो कालकेय-जैसे दानवोंको आकाशसे खींचकर पृथ्वीपर गिरा सकता हूँ। इसी प्रकार स्वर्गसे प्रह्लादके प्रभुत्वका भी अन्त कर सकता हूँ, फिर मनुष्योंमें कौन ऐसा है जो कष्ट देनेके लिये मुझपर प्रहार कर सके? ।। ३० ।।

अग्निरुवाच

यत्र शर्यातिं च्यवनो याजयिष्यन्
सहाश्विभ्यां सोममगृह्णादेकः ।
तं त्वं क्रुद्धः प्रत्यषेधीः पुरस्ता-
च्छार्यातियज्ञं स्मर तं महेन्द्र ।। ३१ ।।
**अग्निदेवने कहा—**महेन्द्र! राजा शर्यातिके उस यज्ञका तो स्मरण कीजिये, जहाँ महर्षि च्यवन उनका यज्ञ करानेवाले थे। आप क्रोधमें भरकर उन्हें मना करते ही रह गये और उन्होंने अकेले अपने ही प्रभावसे सम्पूर्ण देवताओंसहित अश्विनीकुमारोंके साथ सोमरसका पान किया ।। ३१ ।।
वज्रं गृहीत्वा च पुरन्दर त्वं
सम्प्राहार्षीश्च्यवनस्यातिघोरम् ।
स ते विप्रः सह वज्रेण बाहु-
मपगृह्णात् तपसा जातमन्युः ।। ३२ ।।
पुरंदर! उस समय आप अत्यन्त भयंकर वज्र लेकर महर्षि च्यवनके ऊपर प्रहार करना ही चाहते थे; किंतु उन ब्रह्मर्षिने कुपित होकर अपने तपोबलसे आपकी बाँहको वज्रसहित जकड़ दिया ।। ३२ ।।
ततो रोषात् सर्वतो घोररूपं
सपत्नं ते जनयामास भूखः ।
मदं नामासुरं विश्वरूपं
यं त्वं दृष्ट्वा चक्षुषी संन्यमीलः ।। ३३ ।।
तदनन्तर उन्होंने पुनः रोषपूर्वक आपके लिये सब ओरसे भयानक रूपवाले एक शत्रुको उत्पन्न किया। जो सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त मद नामक असुर था और जिसे देखते ही आपने अपनी आँखें बंद कर ली थीं ।। ३३ ।।
हनुरेका जगतीस्था तथैका
दिवं गता महतो दानवस्य ।
सहस्रं दन्तानां शतयोजनानां
सुतीक्ष्णानां घोररूपं बभूव ।। ३४ ।।
उस विशालकाय दानवकी एक ठोढ़ी पृथ्वीपर टिकी हुई थी और दूसरा ऊपरका ओठ स्वर्गसे जा लगा था। उसके सैकड़ों योजन लंबे सहस्रों तीखे दाँत थे, जिससे उसका रूप

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