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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,566 pages

Page 1616 of 2566

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बड़ा भयंकर प्रतीत होता था ।। ३४ ।। वृत्ताः स्थूला रजतस्तम्भवर्णा दंष्ट्राश्चतस्रो द्वे शते योजनानाम् । स त्वां दन्तान् विदशन्नभ्यधाव- ञ्जिघांसया शूलमुद्यम्य घोरम् ।। ३५ ।। उसकी चार दाढ़ें गोलाकार, मोटी और चाँदीके खम्भोंके समान चमकीली थीं। उनकी लंबाई दो-दो सौ योजनकी थी। वह दानव भयंकर त्रिशूल लेकर आपको मार डालनेकी इच्छासे दाँत पीसता हुआ दौड़ा था ।। ३५ ।।

अपश्यस्त्वं तं तदा घोररूपं सर्वे वै त्वां ददृशुर्दर्शनीयम् । यस्माद् भीतः प्राञ्जलिस्त्वं महर्षि- मागच्छेथाः शरणं दानवघ्न ।। ३६ ।। दानवदलन देवराज! आपने उस समय उस घोररूपधारी दानवको देखा था और अन्य सब लोगोंने आपकी ओर भी दृष्टिपात किया था। उस अवसरपर भयके कारण आपकी जो दशा हुई थी, वह देखने ही योग्य थी। आप उस दानवसे भयभीत हो हाथ जोड़कर महर्षि च्यवनकी शरणमें गये थे ।। ३६ ।।

क्षात्राद् बलाद् ब्रह्मबलं गरीयो न ब्रह्मणतः किंचिदन्यद् गरीयः । सोऽहं जानन् ब्रह्मतेजो यथाव- न्न संवर्तं जेतुमिच्छामि शक्र ।। ३७ ।। अतः देवेन्द्र! क्षात्रबलकी अपेक्षा ब्राह्मणबल श्रेष्ठतम है। ब्राह्मणसे बढ़कर दूसरी कोई शक्ति नहीं है। मैं ब्रह्मतेजको अच्छी तरह जानता हूँ; अतः संवर्तको जीतनेकी मुझे इच्छातक नहीं होती है ।। ३७ ।।

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि संवर्तमरुत्तीये नवमोऽध्याय ।। ९ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें संवर्त और मरुत्तका उपाख्यानविषयक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९ ।।