महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextबृहस्पतिं याजकं त्वं वृणीष्व वज्रं वा ते प्रहरिष्यामि घोरम्। वचश्चेदेतन्न करिष्यसे मे प्राहैतदेतावदचिन्त्यकर्मा ॥ ५ ॥ अचिन्त्यकर्मा इन्द्र कहते हैं—‘राजन्! आप बृहस्पतिको अपने यज्ञका पुरोहित बनाइये। यदि आप मेरी यह बात नहीं मानेंगे तो मैं आपपर भयंकर वज्रका प्रहार करूँगा’ ॥ ५ ॥
मरुत्त उवाच
त्वं चैवैतद् वेत्थ पुरंदरश्च विश्वेदेवा वसवश्चाश्विनौ च। मित्रद्रोहे निष्कृतिर्नास्ति लोके महत् पापं ब्रह्महत्यासमं तत् ॥ ६ ॥ मरुत्तने कहा—गन्धर्वराज! आप, इन्द्र, विश्वेदेव, वसुगण तथा अश्विनीकुमार भी इस बातको जानते हैं कि मित्रके साथ द्रोह करनेपर ब्रह्महत्याके समान महान् पाप लगता है। उससे छुटकारा पानेका संसारमें कोई उपाय नहीं है ॥ ६ ॥
बृहस्पतिर्याजयतां महेन्द्रं देवश्रेष्ठं वज्रभृतां वरिष्ठम्। संवर्तो मां याजयिताद्य राजन् न ते वाक्यं तस्य वा रोचयामि ॥ ७ ॥ गन्धर्वराज! बृहस्पतिजी वज्रधारियोंमें श्रेष्ठ देवेश्वर महेन्द्रका यज्ञ करायें। मेरा यज्ञ तो अब संवर्तजी ही करायेंगे। इसके विरुद्ध न तो मैं आपकी बात मानूँगा और न इन्द्रकी ही ॥ ७ ॥
गन्धर्व उवाच
घोरो नादः श्रूयतां वासवस्य नभस्तले गर्जतो राजसिंह। व्यक्तं वज्रं मोक्ष्यते ते महेन्द्रः क्षेमं राजंश्चिन्त्यतामेष कालः ॥ ८ ॥ गन्धर्वराजने कहा—राजसिंह! आकाशमें गर्जना करते हुए इन्द्रका वह घोर सिंहनाद सुनिये। जान पड़ता है, महेन्द्र आपके ऊपर वज्र छोड़ना ही चाहते हैं; अतः राजन्! अपनी रक्षा एवं भलाईका उपाय सोचिये। इसके लिये यही अवसर है ॥ ८ ॥
व्यास उवाच