महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextइत्येवमुक्तो धृतराष्ट्रेण राजन् श्रुत्वा नादं नदतो वासवस्य । तपोनित्यं धर्मविदां वरिष्ठं संवर्तं तं ज्ञापयामास कार्यम् ॥ ९ ॥ **व्यासजी कहते हैं—**राजन्! धृतराष्ट्रके ऐसा कहनेपर राजा मरुत्तने आकाशमें गरजते हुए इन्द्रका शब्द सुनकर सदा तपस्यामें तत्पर रहनेवाले धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ संवर्तको इन्द्रके इस कार्यकी सूचना दी ॥ ९ ॥
मरुत्त उवाच
इममात्मानं प्लवमानमारा- दध्वा दूरं तेन न दृश्यतेऽद्य । प्रपद्येऽहं शर्म विप्रेन्द्र त्वत्तः प्रयच्छ तस्मादभयं विप्रमुख्य ॥ १० ॥ अयमायाति वै वज्री दिशो विद्योतयन् दश । अमानुषेण घोरेण सदस्यास्त्रासिता हि नः ॥ ११ ॥ **मरुत्तने कहा—**विप्रवर! देवराज इन्द्र दूरसे ही प्रहार करनेकी चेष्टा कर रहे हैं, वे दूरकी राहपर खड़े हैं, इसलिये उनका शरीर दृष्टिगोचर नहीं होता। ब्राह्मणशिरोमणे! मैं आपकी शरणमें हूँ और आपके द्वारा अपनी रक्षा चाहता हूँ, अतः आप कृपा करके मुझे अभय-दान दें। देखिये, ये वज्रधारी इन्द्र दसों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए चले आ रहे हैं। इनके भयंकर एवं अलौकिक सिंहनादसे हमारी यज्ञशालाके सभी सदस्य थर्रा उठे हैं ॥ १०-११ ॥