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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,566 pages

Page 1623 of 2566

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Page 1623

शोशुभ्यते बलवृत्रघ्न भूयः पिबस्व सोमं सुतमुद्यतं मया ॥ २२ ॥

संवर्तने कहा—पुरुहूत इन्द्र! आपका स्वागत है। विद्वन्! आपके यहाँ पधारनेसे इस यज्ञकी शोभा बहुत बढ़ गयी है। बल और वृत्रासुरका वध करनेवाले देवराज! मेरेद्वारा तैयार किया हुआ यह सोमरस प्रस्तुत है, आप इसका पान कीजिये ॥ २२ ॥

मरुत्त उवाच

शिवेन मां पश्य नमश्च तेऽस्तु प्राप्तो यज्ञः सफलं जीवितं मे । अयं यज्ञं कुरुते मे सुरेन्द्र बृहस्पतेरवरजो विप्रमुख्यः ॥ २३ ॥

मरुत्तने कहा—सुरेन्द्र! आपको नमस्कार है। आप मुझे कल्याणमयी दृष्टिसे देखिये। आपके पदार्पणसे मेरा यज्ञ और जीवन सफल हो गया। बृहस्पतिजीके छोटे भाई ये विप्रवर संवर्तजी मेरा यज्ञ करा रहे हैं ॥ २३ ॥

इन्द्र उवाच

जानामि ते गुरुमेनं तपोधनं बृहस्पतेरनुजं तिग्मतेजसम् । यस्याह्वानादागतोऽहं नरेन्द्र प्रीतिर्मेऽद्य त्वयि मन्युः प्रणष्टः ॥ २४ ॥

इन्द्रने कहा—नरेन्द्र! आपके इन गुरुदेवको मैं जानता हूँ। ये बृहस्पतिजीके छोटे भाई और तपस्याके धनी हैं। इनका तेज दुःसह है। इन्हींके आवाहनसे मुझे आना पड़ा है। अब मैं आपपर प्रसन्न हूँ और मेरा सारा क्रोध दूर हो गया है ॥ २४ ॥

संवर्त उवाच

यदि प्रीतस्त्वमसि वै देवराज तस्मात्स्वयं शाधि यज्ञे विधानम् । स्वयं सर्वान् कुरु भागान् सुरेन्द्र जानात्वयं सर्वलोकश्च देव ॥ २५ ॥

संवर्तने कहा—देवराज! यदि आप प्रसन्न हैं तो यज्ञमें जो-जो कार्य आवश्यक है, उसका स्वयं ही उपदेश दीजिये तथा सुरेन्द्र! स्वयं ही सब देवताओंके भाग निश्चित कीजिये। देव! यहाँ आये हुए सब लोग आपकी प्रसन्नताका प्रत्यक्ष अनुभव करें ॥ २५ ॥

व्यास उवाच

एवमुक्तस्त्वाङ्गिरसेन शक्रः

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