महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextसमादिदेश स्वयमेव देवान् । सभाः क्रियन्तामावसथाश्च मुख्याः सहस्रशश्चित्रभूताः समृद्धाः ॥ २६ ॥ **व्यासजी कहते हैं—**राजन्! संवर्तके यों कहनेपर इन्द्रने स्वयं ही सब देवताओंको आज्ञा दी कि 'तुम सब लोग अत्यन्त समृद्ध एवं चित्र-विचित्र ढंगके हजारों अच्छे सभा-भवन बनाओ ॥ २६ ॥
क्लृप्ताः स्थूणाः कुरुतारोहणानि गन्धर्वाणामप्सरसां च शीघ्रम् । यत्र नृत्येन्नप्सरसः समस्ताः स्वर्गोपमः क्रियतां यज्ञवाटः ॥ २७ ॥ 'गन्धर्वों और अप्सराओंके लिये ऐसे रंगमण्डपका निर्माण करो, जिसमें बहुत-से सुन्दर स्तम्भ लगे हों। उनके रंगमंचपर चढ़नेके लिये बहुत-सी सीढ़ियाँ बना दो। यह सब कार्य शीघ्र हो जाना चाहिये। यह यज्ञशाला स्वर्गके समान सुन्दर एवं मनोहर बना दो। जिसमें सारी अप्सराएँ नृत्य कर सकें' ॥ २७ ॥
इत्युक्तास्ते चक्रुराशु प्रतीता दिवौकसः शक्रवाक्यान्ररेन्द्र । ततो वाक्यं प्राह राजानमिन्द्रः प्रीतो राजन् पूज्यमानो मरुत्तम् ॥ २८ ॥ नरेन्द्र! देवराजके ऐसा कहनेपर सम्पूर्ण देवताओंने संतुष्ट होकर उनकी आज्ञाके अनुसार शीघ्र ही सबका निर्माण किया। राजन्! तत्पश्चात् पूजित एवं संतुष्ट हुए इन्द्रने राजा मरुत्तसे इस प्रकार कहा— ॥ २८ ॥
एष त्वयाहमिह राजन् समेत्य ये चाप्यन्ये तव पूर्वे नरेन्द्र । सर्वांश्चान्या देवताः प्रीयमाणा हविस्तुभ्यं प्रतिगृह्णन्तु राजन् ॥ २९ ॥ 'राजन्! यह मैं यहाँ आकर तुमसे मिला हूँ। नरेन्द्र! तुम्हारे जो अन्यान्य पूर्वज हैं, वे तथा अन्य सब देवता भी यहाँ प्रसन्नतापूर्वक पधारे हैं। राजन्! ये सब लोग तुम्हारा दिया हुआ हविष्य ग्रहण करेंगे ॥ २९ ॥
आग्नेयं वै लोहितमालभन्तां वैश्वदेवं बहुरूपं हि राजन् । नीलं चोक्षाणं मेध्यमप्यालभन्तां चलच्छिश्नं सम्प्रदिष्टं द्विजाग्रयाः ॥ ३० ॥