महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextपञ्चदशोऽध्यायः
भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनसे द्वारका जानेका प्रस्ताव करना
जनमेजय उवाच
विजिते पाण्डवेयैस्तु प्रशान्ते च द्विजोत्तम ।
राष्ट्रे किं चक्रतुर्वीरौ वासुदेवधनंजयौ ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**द्विजश्रेष्ठ! जब पाण्डवोंने अपने राष्ट्रपर विजय पा ली और राज्यमें सब ओर शान्ति स्थापित हो गयी, उसके बाद श्रीकृष्ण और अर्जुन इन दोनों वीरोंने क्या किया? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
विजिते पाण्डवै राजन् प्रशान्ते च विशाम्पते ।
राष्ट्रे बभूवतुर्हृष्टौ वासुदेवधनंजयौ ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**प्रजानाथ! नरेश्वर! जब पाण्डवोंने राष्ट्रपर विजय पा ली और सर्वत्र शान्ति स्थापित हो गयी, तब भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ २ ॥
विजह्राते मुदा युक्तौ दिवि देवेश्वराविव ।
तौ वनेषु विचित्रेषु पर्वतेषु ससानुषु ॥ ३ ॥
स्वर्गलोकमें विहार करनेवाले दो देवेश्वरोंकी भाँति वे दोनों मित्र आनन्दमग्न हो विचित्र-विचित्र वनोंमें और पर्वतोंके सुरम्य शिखरोंपर विचरने लगे ॥ ३ ॥
तीर्थेषु चैव पुण्येषु पल्वलेषु नदीषु च ।
चङ्क्रम्यमाणौ संहृष्टावश्विनाविव नन्दने ॥ ४ ॥
पवित्र तीर्थों, छोटे तालाबों और नदियोंके तटोंपर विचरण करते हुए वे दोनों नन्दन-वनमें विहार करनेवाले अश्विनीकुमारोंके समान हर्षका अनुभव करते थे ॥ ४ ॥
इन्द्रप्रस्थे महात्मानौ रेमतुः कृष्णपाण्डवौ ।
प्रविश्य तां सभां रम्यां विजह्राते च भारत ॥ ५ ॥
भरतनन्दन! फिर इन्द्रप्रस्थमें लौटकर महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुन मयनिर्मित रमणीय सभामें प्रवेश करके आनन्दपूर्वक मनोविनोद करने लगे ॥ ५ ॥
तत्र युद्धकथाश्चित्राः परिक्लेशांश्च पार्थिव ।
कथायोगे कथायोगे कथयामासतुः सदा ॥ ६ ॥
ऋषीणां देवतानां च वंशांस्तावाहतुः सदा ।