महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextसंसारान्तर्हि ते मूढास्तिर्यग्योनिष्वनेकशः ।। 'जो लोग मुझे केवल मनुष्य-शरीरमें ही समझकर मेरी अवहेलना करते हैं, वे मूर्ख हैं और संसारके भीतर बारंबार तिर्यग्योनियोंमें भटकते रहते हैं ।।'
ये च मां सर्वभूतस्थं पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषा । मद्भक्तांस्तान् सदा युक्तान् मत्समीपं नयाम्यहम् ।। 'इसके विपरीत जो ज्ञानदृष्टिसे मुझे सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित देखते हैं, वे सदा मुझमें मन लगाये रहनेवाले मेरे भक्त हैं, ऐसे भक्तोंको मैं परम धाममें अपने पास बुला लेता हूँ ।।'
मद्भक्ता न विनश्यन्ति मद्भक्ता वीतकल्मषाः । मद्भक्तानां तु मानुष्ये सफलं जन्म पाण्डव ।। 'पाण्डुपुत्र! मेरे भक्तोंका नाश नहीं होता, वे निष्पाप होते हैं। मनुष्योंमें उन्हींका जन्म सफल है, जो मेरे भक्त हैं ।।'
अपि पापेष्वभिरता मद्भक्ताः पाण्डुनन्दन । मुच्यन्ते पातकैः सर्वैः पद्मपत्रमिवाम्भसा ।। 'पाण्डुनन्दन! पापोंमें अभिरत रहनेवाले मनुष्य भी यदि मेरे भक्त हो जायँ तो वे सारे पापोंसे वैसे ही मुक्त हो जाते हैं, जैसे जलसे कमलका पत्ता निर्लिप्त रहता है ।।'
जन्मान्तरसहस्रेषु तपसा भावितात्मनाम् । भक्तिरुत्पद्यते तात मनुष्याणां न संशयः ।। 'हजारों जन्मोंतक तपस्या करनेसे जब मनुष्योंका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है, तब उसमें निःसंदेह भक्तिका उदय होता है ।।'
यच्च रूपं परं गुह्यं कूटस्थमचलं ध्रुवम् । न दृश्यते तथा देवैर्मद्भक्तैर्दृश्यते यथा ।। 'मेरा जो अत्यन्त गोपनीय कूटस्थ, अचल और अविनाशी परस्वरूप है, उसका मेरे भक्तोंको जैसा अनुभव होता है, वैसा देवताओंको भी नहीं होता ।।'
अपरं यच्च मे रूपं प्रादुर्भावेषु दृश्यते । तदर्चयन्ति सर्वार्थैः सर्वभूतानि पाण्डव ।। 'पाण्डव! जो मेरा अपरस्वरूप है, वह अवतार लेनेपर दृष्टिगोचर होता है। संसारके समस्त जीव सब प्रकारके पदार्थोंसे उसकी पूजा करते हैं ।।'
कल्पकोटिसहस्रेषु व्यतीतेष्वागतेषु च । दर्शयामीह तद् रूपं यच्च पश्यन्ति मे सुराः ।। 'हजारों और करोड़ों कल्प आकर चले गये, पर जिस वैष्णवरूपको देवगण देखते हैं, उसी रूपसे मैं भक्तोंको दर्शन देता हूँ ।।'
स्थित्युत्पत्त्यव्ययकरं यो मां ज्ञात्वा प्रपद्यते । अनुगृह्णाम्यहं तं वै संसारान्मोचयामि च ।।