महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context'जो मनुष्य मुझे जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और संहारका कारण समझकर मेरी शरण लेता है, उसके ऊपर कृपा करके मैं उसे संसार-बन्धनसे मुक्त कर देता हूँ ।। अहमादिर्हि देवानां सृष्टा ब्रह्मादयो मया । प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य जगत् सर्वं सृजाम्यहम् ।। 'मैं ही देवताओंका आदि हूँ। ब्रह्मा आदि देवताओंकी मैंने ही सृष्टि की है। मैं ही अपनी प्रकृतिका आश्रय लेकर सम्पूर्ण संसारकी सृष्टि करता हूँ ।। तमोमूलोऽहमव्यक्तो रजोमध्ये प्रतिष्ठितः । ऊर्ध्वं सत्त्वं विना लोभं ब्रह्मादिस्तम्बपर्यतः ।। 'मैं अव्यक्त परमेश्वर ही तमोगुणका आधार, रजोगुणके भीतर स्थित और उत्कृष्ट सत्त्वगुणमें भी व्याप्त हूँ। मुझे लोभ नहीं है। ब्रह्मासे लेकर छोटेसे कीड़ेतक सबमें मैं व्याप्त हो रहा हूँ ।। मूर्द्धानं मे विद्धि दिवं चन्द्रादित्यौ च लोचने । गावोऽग्निर्ब्राह्मणो वक्त्रं मारुतः श्वसनं च मे ।। 'द्युलोकको मेरा मस्तक समझो। सूर्य और चन्द्रमा मेरी आँखें हैं। गौ, अग्नि और ब्राह्मण मेरे मुख हैं और वायु मेरी साँस है ।। दिशो मे बाहवश्चाष्टौ नक्षत्राणि च भूषणम् । अन्तरिक्षमुरो विद्धि सर्वभूतावकाशकम् । मार्गों मेघानिलाभ्यां तु यन्ममोदरमव्ययम् ।। 'आठ दिशाएँ मेरी बाँहें, नक्षत्र मेरे आभूषण और सम्पूर्ण भूतोंको अवकाश देनेवाला अन्तरिक्ष मेरा वक्षःस्थल है। बादलों और हवाके चलनेका जो मार्ग है, उसे मेरा अविनाशी उदर समझो ।। पृथिवीमण्डलं यद् वै द्वीपार्णववनैर्युतम् । सर्वसंधारणोपेतं पादौ मम युधिष्ठिर ।। 'युधिष्ठिर! द्वीप, समुद्र और जंगलोंसे भरा हुआ यह सबको धारण करनेवाला भूमण्डल मेरे दोनों पैरोंके स्थानमें है ।। स्थितो ह्येकगुणः खेऽहं द्विगुणश्चास्मि मारुते । त्रिगुणोऽग्नौ स्थितोऽहं वै सलिले च चतुर्गुणः ।। शब्दाद्या ये गुणाः पञ्च महाभूतेषु पञ्चसु । तन्मात्रासंस्थितः सोऽहं पृथिव्यां पञ्चधा स्थितः ।। 'आकाशमें मैं एक गुणवाला हूँ, वायुमें दो गुणवाला हूँ, अग्निमें तीन गुणवाला हूँ और जलमें चार गुणवाला हूँ। पृथिवीमें पाँच गुणोंसे स्थित हूँ। वही मैं तन्मात्रारूप पञ्चमहाभूतोंमें शब्दादि पाँच गुणोंसे स्थित हूँ ।। अहं सहस्रशीर्षस्तु सहस्रवदनेक्षणः ।