महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context**युधिष्ठिरने पूछा—**भगवन्! देवदेवेश्वर! शुभ और अशुभकी वृद्धि और ह्रास क्रमसे किस प्रकार होते हैं, इसे सुननेकी मेरी बड़ी उत्कण्ठा है॥
श्रीभगवानुवाच
शृणु पार्थिव तत्सर्वं धर्मसूक्ष्मं सनातनम् ।
दुर्विज्ञेयतमं नित्यं यत्र मग्ना महाजनाः ॥
**श्रीभगवान्ने कहा—**राजन्! तुमने जो धर्मका तत्त्व पूछा है, वह सूक्ष्म, सनातन, अत्यन्त दुर्विज्ञेय और नित्य है, बड़े-बड़े लोग भी उसमें मग्न हो जाते हैं, वह सब तुम सुनो॥
यथैव शीतमुदकमुष्णेन बहुना वृतम् ।
भवेत्तु तत्क्षणादुष्णं शीतत्वं च विनश्यति ॥
जिस प्रकार थोड़े-से ठंडे जलको बहुत गरम जलमें मिला दिया जाता है तो वह तत्क्षण गरम हो जाता है और उसका ठंडापन नष्ट हो जाता है॥
यथोष्णं वा भवेदल्पं शीतेन बहुना वृतम् ।
शीतलं च भवेत् सर्वमुष्णत्वं च विनश्यति ॥
जब थोड़ा-सा गरम जल बहुत शीतल जलमें मिला दिया जाता है, तब वह सब-का-सब शीतल हो जाता है और उसकी उष्णता नष्ट हो जाती है॥
एवं च यद् भवेद् भूरि सुकृतं वापि दुष्कृतम् ।
तदल्पं क्षपयेच्छीघ्रं नाज कार्या विचारणा ॥
इसी प्रकार जो पुण्य या पाप बहुत अधिक होता है, वह थोड़े पाप-पुण्यको शीघ्र ही नष्ट कर देता है, इसमें कोई संशय नहीं है॥
समत्वे सति राजेन्द्र तयोः सुकृतपापयोः ।
गूहितस्य भवेद् वृद्धिः कीर्तितस्य भवेत् क्षयः ॥
राजेन्द्र! जब वे पुण्य-पाप दोनों समान होते हैं, तब जिसको गुप्त रखा जाता है, उसकी वृद्धि होती है और जिसका वर्णन कर दिया जाता है, उसका क्षय हो जाता है॥
ख्यापनेनानुतापेन प्रायः पापं विनश्यति ।
तथा कृतस्तु राजेन्द्र धर्मो नश्यति मानद ॥
सम्मान देनेवाले नरेश्वर! पापको दूसरोंसे कहने और उसके लिये पश्चात्ताप करनेसे प्रायः उसका नाश हो जाता है। इसी प्रकार धर्म भी अपने मुँहसे दूसरोंके सम्मुख प्रकट करनेपर नष्ट होता है॥
तावुभौ गूहितौ सम्यग् वृद्धिं यातो न संशयः ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन न पापं गूहयेद् बुधः ॥
तस्मादेतत् प्रयत्नेन कीर्तयेत् क्षयकारणात् ॥