महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
DevanagariSanskritpublished2,566 pages
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तस्मात् संकीर्तयेत् पापं नित्यं धर्मं च गूहयेत् ॥
छिपानेपर निःसंदेह ये दोनों ही अधिक बढ़ते हैं। इसलिये समझदार मनुष्यको चाहिये कि सर्वथा उद्योग करके अपने पापको प्रकट कर दे, उसे छिपानेकी कोशिश न करे। पापका कीर्तन पापके नाशका कारण होता है, इसलिये हमेशा पापको प्रकट करना और धर्मको गुप्त रखना चाहिये ॥
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)