महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
Page 2118 of 2566
Read in context'उसका जल ठण्डा, अक्षय और अमृतके समान मधुर है तथा वह ठंडे जलका दान करनेवाले लोगोंको सदा सुख पहुँचाता है ।। प्रणश्यत्यम्बुपानेन बुभुक्षा च युधिष्ठिर । तृषितस्य न चान्नेन पिपासाभिप्रणश्यति । तस्मात् तोयं सदा देयं तृषितेभ्यो विजानता ।। 'युधिष्ठिर! जल पीनेसे भूख भी शान्त हो जाती है; किंतु प्यासे मनुष्यकी प्यास अन्नसे नहीं बुझती, इसलिये समझदार मनुष्यको चाहिये कि वह प्यासेको सदा पानी पिलाया करे ।। अग्नेर्मूर्तिः क्षितेर्योनिरमृतस्य च सम्भवः । अतोऽम्भः सर्वभूतानां मूलमित्युच्यते बुधैः ।। 'जल अग्निकी मूर्ति है, पृथ्वीकी योनि (कारण) है और अमृतका उत्पत्ति स्थान है। इसलिये समस्त प्राणियोंका मूल जल है—ऐसा बुद्धिमान् पुरुषोंने कहा है ।। अद्भिः सर्वाणि भूतानि जीवन्ति प्रभवन्ति च । तस्मात् सर्वेषु दानेषु तोयदानं विशिष्यते ।। 'सब प्राणी जलसे पैदा होते हैं और जलसे ही जीवन धारण करते हैं। इसलिये जलदान सब दानोंसे बढ़कर माना गया है ।। ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यस्त्वन्नदानं सुसंस्कृतम् । तैस्तु दत्ताः स्वयं प्राणा भवन्ति भरतर्षभ ।। 'भरतश्रेष्ठ! जो लोग ब्राह्मणोंको सुपक्व अन्नदान करते हैं, वे मानो साक्षात् प्राण-दान करते हैं ।। अन्नाद् रक्तं च शुक्रं च अन्ने जीवः प्रतिष्ठितः । इन्द्रियाणि च बुद्धिश्च पुष्णन्त्यन्नेन नित्यशः । अन्नहीनानि सीदन्ति सर्वभूतानि पाण्डव ।। 'पाण्डुनन्दन! अन्नसे रक्त और वीर्य उत्पन्न होता है। अन्नमें ही जीव प्रतिष्ठित है। अन्नसे ही इन्द्रियोंका और बुद्धिका सदा पोषण होता है। बिना अन्नके समस्त प्राणी दुःखित हो जाते हैं ।। तेजो बलं च रूपं च सत्त्वं वीर्यं धृतिर्द्युतिः । ज्ञानं मेधा तथाऽऽयुश्च सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम् ।। 'तेज, बल, रूप, सत्त्व, वीर्य, धृति, द्युति, ज्ञान, मेधा और आयु—इन सबका आधार अन्न ही है ।। देवमानवतिर्यक्षु सर्वलोकेषु सर्वदा । सर्वकालं हि सर्वेषां अन्ने प्राणाः प्रतिष्ठिताः ।।