महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2117, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें[जल-दान, अन्न-दान और अतिथि-सत्कारका माहात्म्य]
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा यमपुराध्वानं जीवानां गमनं तथा ।
धर्मपुत्रः प्रहृष्टात्मा केशवं पुनरब्रवीत् ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यमपुरके मार्गका वर्णन तथा वहाँ जीवोंके (सुखपूर्वक) जानेका उपाय सुनकर राजा युधिष्ठिर मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए और भगवान् श्रीकृष्णसे फिर बोले— ॥
देवदेवेश दैत्यघ्न ऋषिसंघैरभिष्टुत ।
भगवन् भवहन् श्रीमन् सहस्रादित्यसंनिभ ॥
‘देवदेवेश्वर! आप सम्पूर्ण दैत्योंका वध करनेवाले हैं, ऋषियोंके समुदाय सदा आपकी ही स्तुति करते हैं, आप षडैश्वर्यसे युक्त, भवबन्धनसे मुक्ति देनेवाले, श्रीसम्पन्न और हजारों सूर्योंके समान तेजस्वी हैं ॥
सर्वसम्भव धर्मज्ञ सर्वधर्मप्रवर्तक ।
सर्वदानफलं सौम्य कथयस्व ममाच्युत ॥
‘धर्मज्ञ! आपहीसे सबकी उत्पत्ति हुई है और आप ही सम्पूर्ण धर्मोंके प्रवर्तक हैं। शान्तस्वरूप अच्युत! मुझे सब प्रकारके दानोंका फल बतलाइये ॥
एवमुक्तो हृषीकेशो धर्मपुत्रेण धीमता ।
उवाच धर्मपुत्राय पुण्यान् धर्मान् महोदयान् ॥
बुद्धिमान् धर्मपुत्र युधिष्ठिरके द्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर हृषीकेश भगवान् श्रीकृष्ण धर्मपुत्रके प्रति महान् उन्नति करनेवाले पुण्यमय धर्मोंका वर्णन करने लगे— ॥
पानीयं परमं लोके जीवानां जीवनं स्मृतम् ।
पानीयस्य प्रदानेन तृप्तिर्भवति पाण्डव ।
पानीयस्य गुणा दिव्याः परलोके गुणावहाः ॥
‘पाण्डुनन्दन! संसारमें जलको प्राणियोंका परम जीवन माना गया है, उसके दानसे जीवोंकी तृप्ति होती है। जलके गुण दिव्य हैं और वे परलोकमें भी लाभ पहुँचानेवाले हैं ॥
तत्र पुष्पोदकी नाम नदी परमपावनी ।
कामान् ददाति राजेन्द्र तोयदानां यमालये ॥
‘राजेन्द्र! यमलोकमें पुष्पोदकी नामवाली परम पवित्र नदी है। वह जल-दान करनेवाले पुरुषोंकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण करती है ॥
शीतलं सलिलं ह्यत्र ह्यक्षय्यममृतोपमम् ।
शीत्तोयप्रदातॄणां भवेन्नित्यं सुखावहम् ॥