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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,566 pages

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भीमसेनमथापश्यत् तेनैव वपुषान्वितम् ॥ ७ ॥ वायोर्मूर्तिमतरः पार्श्वे दिव्यमूर्त्तिसमन्वितम् । श्रिया परमया युक्तं सिद्धिं परमिकां गतम् ॥ ८ ॥ फिर दूसरे स्थानमें उन्होंने दिव्यरूपधारी भीमसेनको देखा जो पहलेहीके समान शरीर धारण किये मूर्तिमान् वायुदेवताके पास बैठे थे। उन्हें सब ओरसे मरुद्गणोंने घेर रखा था। वे उत्तम कान्तिसे सुशोभित एवं उत्कृष्ट सिद्धिको प्राप्त थे ॥ ७-८ ॥ अश्विनोस्तु तथा स्थाने दीप्यमानौ स्वतेजसा । नकुलं सहदेवं च ददर्श कुरुनन्दनः ॥ ९ ॥ कुरुनन्दन युधिष्ठिरने नकुल और सहदेवको अश्विनीकुमारोंके स्थानमें विराजमान देखा जो अपने तेजसे उद्दीप्त हो रहे थे ॥ ९ ॥ तथा ददर्श पाञ्चालीं कमलोत्पलमालिनीम् । वपुषा स्वर्गमाक्रम्य तिष्ठन्तीमर्कवर्चसम् ॥ १० ॥ तदनन्तर उन्होंने कमलोंकी मालासे अलंकृत पाञ्चालराजकुमारी द्रौपदीको देखा जो अपने तेजस्वी स्वरूपसे स्वर्गलोकको अभिभूत करके विराज रही थीं। उनकी दिव्य कान्ति सूर्यदेवकी भाँति प्रकाशित हो रही थी ॥ १० ॥ अखिलं सहसा राजा प्रष्टुमैच्छद् युधिष्ठिरः । ततोऽस्य भगवानिन्द्रः कथयामास देवराट् ॥ ११ ॥ राजा युधिष्ठिरने इन सबके विषयमें सहसा प्रश्न करनेका विचार किया। तब देवराज भगवान् इन्द्र स्वयं ही उन्हें सबका परिचय देने लगे— ॥ ११ ॥ श्रीरेषा द्रौपदीरूपा त्वदर्थे मानुषं गता । अयोनिशा लोककान्ता पुण्यगन्धा युधिष्ठिर ॥ १२ ॥ ‘युधिष्ठिर! ये जो लोककमनीय विग्रहसे युक्त पवित्र गन्धवाली देवी दिखायी दे रही हैं, साक्षात् भगवती लक्ष्मी हैं। ये ही तुम्हारे लिये मनुष्यलोकमें जाकर अयोनिसम्भूता द्रौपदीके रूपमें अवतीर्ण हुई थीं ॥ १२ ॥ रत्यर्थं भवतां ह्येषा निर्मिता शूलपाणिना । द्रुपदस्य कुले जाता भवद्भिश्चोपजीविता ॥ १३ ॥ ‘स्वयं भगवान् शंकरने तुमलोगोंकी प्रसन्नताके लिये इन्हें प्रकट किया था और ये ही द्रुपदके कुलमें जन्म धारणकर तुम सब भाइयोंके द्वारा अनुगृहीत हुई थीं ॥ १३ ॥ एते पञ्च महाभागा गन्धर्वाः पावकप्रभाः । द्रौपद्यास्तनया राजन् युष्माकममितौजसः ॥ १४ ॥ ‘राजन्! ये जो अग्निके समान तेजस्वी और महान् सौभाग्यशाली पाँच गन्धर्व दिखायी देते हैं, ये ही तुमलोगोंके वीर्यसे उत्पन्न हुए द्रौपदीके अनन्त बलशाली पुत्र हुए थे ॥ १४ ॥ पश्य गन्धर्वराजानं धृतराष्ट्रं मनीषिणम् ।