महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2527, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽध्यायः
युधिष्ठिरका दिव्यलोकमें श्रीकृष्ण, अर्जुन आदिका दर्शन करना
वैशम्पायन उवाच
ततो युधिष्ठिरो राजा देवैः सर्षिमरुद्गणैः । स्तूयमानो ययौ तत्र यत्र ते कुरुपुङ्गवाः ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर देवताओं, ऋषियों और मरुद्गणोंके मुँहसे अपनी प्रशंसा सुनते हुए राजा युधिष्ठिर क्रमशः उस स्थानपर जा पहुँचे जहाँ वे कुरुश्रेष्ठ भीमसेन और अर्जुन आदि विराजमान थे ॥ १ ॥
ददर्श तत्र गोविन्दं ब्राह्मेण वपुषान्वितम् । तेनैव दृष्टपूर्वेण सादृश्येनैव सूचितम् ॥ २ ॥ वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि भगवान् श्रीकृष्ण अपने ब्राह्मविग्रहसे सम्पन्न हैं। पहलेके देखे गये सादृश्यसे ही वे पहचाने जाते हैं ॥ २ ॥
दीप्यमानं स्ववपुषा दिव्यैरस्त्रैरुपस्थितम् । चक्रप्रभृतिभिर्घोरैर्दिव्यैः पुरुषविग्रहैः ॥ ३ ॥ उनके श्रीविग्रहसे अद्भुत दीप्ति छिटक रही है। चक्र आदि दिव्य एवं भयंकर अस्त्र-शस्त्र दिव्य पुरुषविग्रह धारण करके उनकी सेवामें उपस्थित हैं ॥ ३ ॥
उपास्यमानं वीरेण फाल्गुनेन सुवर्चसा । तथास्वरूपं कौन्तेयो ददर्श मधुसूदनम् ॥ ४ ॥ अत्यन्त तेजस्वी वीरवर अर्जुन भगवान्की आराधनामें लगे हुए हैं। कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने भगवान् मधुसूदनका उसी स्वरूपमें दर्शन किया ॥ ४ ॥
तावुभौ पुरुषव्याघ्रौ समुद्वीक्ष्य युधिष्ठिरम् । यथावत् प्रतिपेदाते पूजया देवपूजितौ ॥ ५ ॥ पुरुषसिंह अर्जुन और श्रीकृष्ण देवताओंद्वारा पूजित थे। इन दोनोंने युधिष्ठिरको उपस्थित देख उनका यथावत् सम्मान किया ॥ ५ ॥
अपरस्मिन्नथोद्देशे कर्णं शस्त्रभृतां वरम् । द्वादशादित्यसहितं ददर्श कुरुनन्दनः ॥ ६ ॥ इसके बाद दूसरी ओर दृष्टि डालनेपर कुरुनन्दन युधिष्ठिरने शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ कर्णको देखा जो बारह आदित्योंके साथ (तेजोमय स्वरूप धारण किये) विराजमान थे ॥ ६ ॥
अथापरस्मिन्नुद्देशे मरुद्गणवृतं विभुम् ।