मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context२ मनुस्मृति। आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम्। अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः॥ ५॥ ततः स्वयम्भूर्भगवानव्यक्तो व्यञ्जयन्निदम्। महाभूतादिवृत्तौजाः प्रादुरासीत्तमोनुदः॥ ६॥ योऽसावतीन्द्रियग्राह्यः सूक्ष्मोऽव्यक्तः सनातनः। सर्वभूतमयोऽचिन्त्यः स एव स्वयमुद्बभौ॥ ७॥ सोऽभिध्याय शरीरात्स्वात्सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः। अप एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत्॥ ८॥ तदण्डमभवद्धैमं सहस्रांशुसमप्रभम्। तस्मिञ्जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः॥ ६॥ जगत् की सृष्टि। यह संसार अपनी उत्पत्ति के पूर्व अन्धकारमय था † अज्ञात था, इसका कोई लक्षण न था *। किसी अनुमान से जानने लायक़ न था। चारों तरफ़ से मानो सोया हुआ था। इस महाप्रलय स्थिति के अनन्तर, सृष्टि के आरम्भ में, पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश आदि विश्वको सूक्ष्मरूप से, स्थूलरूप में प्रकट करनेकी इच्छा से अतीन्द्रिय, महासूक्ष्म, नित्य, विश्वव्यापक, अचिन्त्य परमात्मा ने, अपने को जाहिर किया। अर्थात् महत्तत्त्व आदि की उत्पत्ति द्वारा अपनी शक्ति को संसार में प्रकट किया। उसके बाद नानाविध प्रजासृष्टिकी इच्छा से, पूर्व जलसृष्टि करके, उसमें अपना शक्ति- रूप बीज स्थापित किया॥ ५-८॥ वह बीज ईश्वरेच्छा से, सूर्य के समान चमकीला सुवर्ण कासा गोला ‡ होगया। उसमें संपूर्ण विश्व के पितामह स्वयं ब्रह्मा का प्रादुर्भाव हुआ॥ ६॥ † श्रुति है 'तम आसीत् तमसा गूढमग्रे इति।'
- श्रुति है 'तद्धीदन्तर्ह्यव्याकृतमासीत्।' छान्दोग्य श्रुति है 'सदेव सौम्येदमग्र आसीत्।' ‡ इसी अण्ड से हिरण्यगर्भ नामसे परमात्मा का प्रादुर्भाव हुआ है। वैदिक श्रुतीभी है:- 'हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। सदाधारपृथिवीं द्यामुतेमाम्।'