मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextपहला अध्याय । आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः । ता यदस्यायनं पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः ॥ १० ॥ यत्तत्कारणमव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम् । तद्विसृष्टः स पुरुषो लोके ब्रह्मेति कीर्त्यते ॥ ११ ॥ तस्मिन्नण्डे स भगवानुषित्वा परिवत्सरम् । स्वयमेवात्मनो ध्यानात्तदण्डमकरोद्द्विधा ॥ १२ ॥ ताभ्यां स शकलाभ्यां च दिवं भूमिं च निर्ममे । मध्ये व्योम दिशश्चाष्टावपां स्थानं च शाश्वतम् ॥ १३ ॥ जल को नार कहते हैं क्योंकि वे नर नामक परमात्मा से पैदा हुए हैं। जल में ही परमात्मा ने ब्रह्मरूप से पहले स्थिति की है* । इसलिये परमात्मा को नारायण कहते हैं। जो सारे जगत् का उपादान कारण है, अप्रकट है, सनातन है, सत्-असत् पदार्थों का प्रकृतिभूत है, उसी से उत्पन्न वह पुरुष, संसार में ब्रह्मा नाम से कहा जाता है। ब्रह्मा ने उस अण्ड में ब्राह्ममान से एक वर्ष रहकर, अपनी इच्छा से उसका दो टुकड़ा किया। ऊपर के भाग से स्वर्लोक, नीचे से भूलोक और दोनों के बीच आकाश बनाकर, आठों दिशा और जल का स्थिर स्थान-समुद्र को बनाया ॥१०-१३॥
- तैत्तिरीय-आरण्यक में, जल से प्रजापति की उत्पत्ति का वर्णन है । 'आपो वै इदमासन् सलिलमेव । स प्रजापतिरेकः पुष्करपर्णे समभवत् । तस्यान्तर्मनसि कामः समवर्तत, 'इदं सृजेयम्' इति । 'आपो ह वा इदमग्रे, सलिलमेवास ।' शतपथब्राह्मण १० । १ । ६ 'तस्याप एव प्रतिष्ठा । अप्सु हि इमे लोकाः प्रतिष्ठिताः ।' शतपथ-ब्राह्मण, ६ । ७ । १ । १७ इस प्रकार कई श्रुति हैं। तैत्तिरीय आरण्यक के प्रथम भाग में, सृष्टिवर्णन विस्तारपूर्वक किया गया है ।