BharatKosha
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 149 of 649

Read in context
Page 149

पहला अध्याय । ६ कृमिकीटपतङ्गांश्च यूकामक्षिकमत्कुणम् । सर्वञ्च दंशमशकं स्थावरञ्च पृथग्विधम् ॥ ४० ॥ एवमेतैरिदं सर्वं मन्नियोगान्महात्मभिः । यथाकर्म तपोयोगात् सृष्टं स्थावरजङ्गमम् ॥ ४१ ॥ इन दश प्रजापतियों ने दूसरे प्रकाशमान सात मनुओं को, देवता और उनके निवासस्थानों को, ब्रह्मर्षियों को पैदा किया । और यक्ष, राक्षस, पिशाच, गन्धर्व, अप्सरा, असुर, नाग, सर्प, सुपर्ण- गरुड़ादि, और पितरों को * उत्पन्न किया । विद्युत्-बिजली, अशनि- एक तरह की बिजली, मेघ, रोहित-एक विचित्र वर्ण दण्डाकार आकाश का चिह्न, इन्द्रधनुष, उल्का जो आकाश से रेखाकार ज्योति गिरती है, निर्घात-उत्पातशब्द, केतु-पूंछदार तारा, और नाना भांति के ज्योति ध्रुव, अगस्त्य आदि को उत्पन्न किया । किं- नर-अश्वमुख-नरदेह, वानर, मत्स्य, तरह तरह के पक्षिगण, पशु, मृग, मनुष्य, सर्प, ऊपर, नीचे दांतवाले जीव, कृमि, कीट, पतङ्ग, जूका, मक्खी, खटमल और संपूर्ण काटनेवाले छोटे जीव मच्छर आदि, मेरी आज्ञा और अपनी तपस्या से मरीचि आदि महात्माओं ने इस स्थावर, जङ्गम विश्व को कर्मानुसार रचा है ॥ ३६-४१ ॥ येषां तु यादृशं कर्म भूतानामिह कीर्तितम् । तत्तथा वोऽभिधास्यामि क्रमयोगं च जन्मनि ॥ ४२ ॥ पशवश्च मृगाश्चैव व्यालाश्चोभयतोदतः । रक्षांसि च पिशाचाश्च मनुष्याश्च जरायुजाः ॥ ४३ ॥

  • तैत्तिरीय ब्राह्मण में लिखा है-प्रजापति ने अपने निश्वास-असुसे असुरों की सृष्टि करके, क्रमसे पितृगण, देवगण आदिकी सृष्टि की है । 'प्रजातिरकामयत 'प्रजायेय' इति । स 'तपोऽम्यतप्यत । तेनासून्रा असुगनसृ- जत । तदनु पितॄनसृजत । तदनु मनुष्यानसृजत । तदनु देवानसृजत ।' तैत्तिरीय ब्राह्मण, २ । ३ । = । २
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित) · Page 149 of 649 · BharatKosha