मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context० मनुस्मृतिः। अण्डजाः पक्षिणः सर्पा नक्रा मत्स्याश्च कच्छपाः । यानि चैवं प्रकाराणि स्थलजान्यौदकानि च ॥ ४४ ॥ स्वेदजं दंशमशकं यूकामक्षिकमत्कुणम् । ऊष्मणश्चोपजायन्ते यच्चान्यत्किञ्चिदीदृशम् ॥ ४५ ॥ उद्भिज्जाः स्थावराः सर्वे बीजकाण्डप्ररोहिणः । ओषध्यः फलपाकान्ता बहुपुष्पफलोपगाः ॥ ४६ ॥ अपुष्पाः फलवन्तो ये ते वनस्पतयः स्मृताः । पुष्पिणः फलिनश्चैव वृक्षास्तूभयतः स्मृताः ॥ ४७ ॥ गुच्छगुल्मं तु विविधं तथैव तृणजातयः । बीजकाण्डरुहाण्येव प्रताना वल्ल्य एव च ॥ ४८ ॥ इस जगत् में जिन प्राणियों का जो कर्म कहा है वैसा ही हम कहेंगे और उनके जन्म का क्रम भी वर्णन करेंगे । सृष्टि चार प्रकार की है, उनको क्रम से कहते हैं-पशु, सिंह, ऊपर नीचे दाँतवाले, सब राक्षस, पिशाच और मनुष्य ये सब 'जरायुज' कहलाते हैं। पक्षी, साँप, नाक, मच्छली, कछुआ और जो ऐसेही भूमि या जल में पैदा होनेवाले जीव हैं वे सब 'अण्डज' हैं । मच्छर, दंश, जूँ, मक्खी, खटमल आदि पसीने की गर्मी से पैदा होनेवाले 'स्वेदज' होते हैं। वृक्ष आदि को 'उद्भिज्ज' कहते हैं। ये दो तरहके हैं, बीज से पैदा होनेवाले और शाखा से पैदा होनेवाले। जो वृक्ष फलोंके पकजाने पर सूख जाते हैं और जो बहुत फल, फूलवाले होते हैं उनको 'ओषधि' कहते हैं। जिन में फल आवें पर फूल नहीं उनको 'वनस्पति' कहते हैं। और जो फल, फूलवाले हैं वे 'वृक्ष' कहे जाते हैं। जिस में जड़ से ही लता का मूलहो, शाखा न हो उसको 'गुच्छ' कहते हैं। गुल्म-ईख वगैरह, तृणजाति-कई भांति के बीज और शाखा से पैदा होनेवाले, प्रतान-जिस में सूतला निकले और वल्ली- गुर्च आदि सब 'उद्भिज्ज' हैं ॥ ४२-४८ ॥