मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
Page 151 of 649
Read in contextपहला अध्याय । ११ तमसा बहुरूपेण वेष्टिताः कर्महेतुना । अन्तःसंज्ञा भवन्त्येते सुखदुःखसमन्विताः ॥ ४६ ॥ एतदन्तास्तु गतयो ब्रह्माद्याः समुदाहृताः । घोरेऽस्मिन् भूतसंसारे नित्यं सततयायिनि ॥ ५० ॥ एवं सर्वं स सृष्ट्वेदं मां चाचिन्त्यपराक्रमः । आत्मन्यन्तर्दधे भूयः कालं कालेन पीडयन् ॥ ५१ ॥ यदा स देवो जागर्ति तदेदं चेष्टते जगत् । यदा स्वपिति शान्तात्मा तदा सर्वं निमीलति ॥ ५२ ॥ तस्मिन् स्वपति तु स्वस्थे कर्मात्मानः शरीरिणः । स्वकर्मभ्यो निवर्तन्ते मनश्च ग्लानिमृच्छति ॥ ५३ ॥ युगपत्तु प्रलीयन्ते यदा तस्मिन्महात्मनि । तदायं सर्वभूतात्मा सुखं स्वपिति निर्वृतः ॥ ५४ ॥ ये सब वृक्ष अज्ञानवश अपने पूर्व जन्म के बुरे कर्मों से घिरे हुए हैं। इनके भीतर छिपा हुआ ज्ञानहै और इनको सुख दुःख भी होता है। इस नाशवान् संसार में ब्रह्मासे लेकर स्थावर तक यही उत्पत्ति का नियम कहा गया है। उस अचिन्त्य प्रभावशाली परमात्मा ने यह विश्व और मेरे को उत्पन्न करके सृष्टिकाल को प्रलयकाल में मिलाकर अपने में लीन करलिया। अर्थात् प्राणियों के कर्मवश बार बार सृष्टि और प्रलय किया करता है। जब परमात्मा जागता है अर्थात् सृष्टि की इच्छा करता है उस समय यह सारा जगत् चेष्टायुक्त होजाता है और जब सोता है याने प्रलय इच्छा करता है, तब विश्व का लय होजाता है। यही परमात्मा का जागना और सोना है। जब वह सोता है-निर्व्यापार रहता है तब कर्मात्मा प्राणी अपने अपने कर्मों से निवृत्त होजाते हैं और मन भी सब इन्द्रियों सहित शान्तभाव को पा जाता है। एकही काल में, जब सारे प्राणी परमात्मा में लय को पाते हैं, तब यह सुख से शयन करता हुआ कहा जाता है ॥ ४६-५४ ॥