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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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३२ : मनुस्मृति । भवत्पूर्वं चरेद्भैक्ष्यमुपनीतो द्विजोत्तमः । भवन्मध्यं तु राजन्यो वैश्यस्तु भवदुत्तरम् ॥ ४६ ॥ मातरं वा स्वसारं वा मातुर्वा भगिनीं निजाम् । भिक्षेत भिक्षां प्रथमं याचैनं नावमानयेत् ॥ ५० ॥ ब्रह्मचारी दण्ड लेकर, सूर्य का आराधन और अग्नि की प्रद्- क्षिणा करके विधिपूर्वक भिक्षा मांगे । ब्राह्मण ब्रह्मचारी भिक्षा मांगते समय, ‘भवति भिक्षां देहि’ क्षत्रिय ‘भिक्षां भवति देहि,’ वैश्य ‘भिक्षां देहि भवति’ ऐसा बोले । ब्रह्मचारी को, पहले माता से, माता की बहन से, बहन से और जो ब्रह्मचारी का अपमान न करती हो उस से भिक्षा मांगना चाहिए ॥ ४८-५० ॥ समाहृत्य तु तद्भैक्ष्यं यावदर्थममायया । निवेद्य गुरवेऽश्नीयादाचम्य प्राङ्मुखः शुचिः ॥ ५१ ॥ आयुष्यं प्राङ्मुखो भुङ्क्ते यशस्यं दक्षिणामुखः । श्रियं प्रत्यङ्मुखो भुङ्क्ते ऋतं भुङ्क्ते ह्युदङ्मुखः॥५२॥ उपस्पृश्य द्विजो नित्यमन्नमद्यात्समाहितः । भुक्त्वा चोपस्पृशेत्सम्यगद्भिः खानि च संस्पृशेत्॥५३॥ पूजयेदशनं नित्यमद्याच्चैतदकुत्सयन् । दृष्ट्वा हृष्येत्प्रसीदेच्च प्रतिनन्देच्च सर्वशः ॥ ५४ ॥ पूजितं ह्यशनं नित्यं बलमूर्जं प्रयच्छति । अपूजितं तु तद्भुक्तमुभयं नाशयेदिदम् ॥ ५५ ॥ अपने प्रयोजन भर को निष्कपटभाव से भिक्षा लाकर, गुरु को निवेदन करे और पवित्रता से पूर्वदिशा को मुख करके आचमन- पूर्वक भोजन करे । आयु के लिए पूर्वमुख, यश के लिए दक्षिण मुख, संपत्ति के लिए पश्चिम मुख, सत्य के लिए उत्तरमुख होकर भोजन करे। द्विजों को नित्य सावधानी से आचमनपूर्वक भोजन