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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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दूसरा अध्याय । ३३ करके फिर आचमन और जल के हाथ से आँख, कान, नाक का स्पर्श करना चाहिए। अन्न को आदर से ग्रहण करे, उसकी निन्दा न करे। उसको देखकर हर्षित, पुलकित होकर सर्वथा प्रशंसा करे। यों आदर से किया हुआ भोजन शरीर और प्राणों को बल देता है नहीं तो दोनों का नाश करता है ॥ ५१-५५ ॥ नोच्छिष्टं कस्यचिद्दद्यान्नाद्याच्चैव तथान्तरा । न चैवाध्यशनं कुर्यान्न चोच्छिष्टः क्वचिद्व्रजेत् ॥ ५६ ॥ अनारोग्यमनायुष्यमस्वर्ग्यं चातिभोजनम् । अपुण्यं लोकविद्विष्टं तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ॥ ५७ ॥ उच्छिष्ट-जूंठा अन्न किसी को न दे, भोजन के बीच ठहर ठहर कर भोजन न करे, अधिक भोजन न करे और जूंठे मुंह कहीं न जाय । अतिभोजन से आरोग्य और आयु में बाधा होती है, यह स्वर्ग और धर्म का विरोधी है। लोक में भी अच्छा नहीं माना जाता, इसलिए अतिभोजन न करना चाहिए ॥ ५६-५७ ॥ ब्राह्मेण विप्रस्तीर्थेन नित्यकालमुपस्पृशेत् । कायत्रैदशिकाभ्यां वा न पित्र्येण कदाचन ॥ ५८ ॥ अङ्गुष्ठमूलस्य तले ब्राह्मं तीर्थं प्रचक्षते । काय मङ्गुलिमूलेऽग्रे दैवं पित्र्यं तयोरधः ॥ ५६ ॥ त्रिराचामेदपः पूर्वं द्विः प्रमृज्यांत्ततो मुखम् । खानि चैव स्पृशेदद्भिरात्मानं शिर एव च ॥ ६० ॥ अनुष्णाभिरफेनाभिरद्भिस्तीर्थेन धर्मवित् । शौचेप्सुः सर्वदाचामेदेकान्ते प्रागुदङ्मुखः ॥ ६१ ॥ हृद्गाभिः पूयते विप्रः कण्ठगाभिस्तु भूमिपः । वैश्योऽद्भिः प्राशिताभिस्तु शूद्रः स्पृष्टाभिरन्ततः ॥ ६२ ॥ ब्राह्मण सदा ब्राह्मतीर्थ से आचमन करे, या प्रजापतितीर्थ