मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context३४ मनुस्मृति । और देवतीर्थ से करे परन्तु पितृतीर्थ से कभी आचमन न करे। अँगूठे के मूल को ब्राह्मतीर्थ कहते हैं । अँगुलीयों के मूलभाग को प्रजापतितीर्थ अग्रभाग को देवतीर्थ और अँगूठा-तर्जनी के मध्य भाग को पितृतीर्थ कहते हैं। आचमन के समय तीन वार आचमन करके दो वार मुख धोवे और आँख, कान, नाक, मुख आदि इन्द्रिय, हृदय और शिर का जल से स्पर्श करे। धर्मज्ञ पुरुष, पवित्र होने की इच्छा से, नित्य, एकान्त में पूर्व या उत्तरमुख बैठकर, शीतल और फेन (झाग) रहित जल से, ब्राह्म आदि तीर्थों से आचमन करे। यह आचमन जल हृदय तक पहुँच जाने से ब्राह्मण, कण्ठतक क्षत्रिय, मुख गीला होने से वैश्य और ओठ स्पर्श से शूद्र पवित्र होता है—अर्थात् इसी हिसाब से जल लेकर अपना अपना आच- मन करना चाहिए ॥ ५८-६२ ॥ उद्धृते दक्षिणे पाणावुपवीतीत्युच्यते द्विजः । सव्ये प्राचीनावीती निवीती कण्ठसज्जने ॥ ६३ ॥ मेखलामजिनं दण्डमुपवीतं कमण्डलुम् । अप्सु प्रास्य विनष्टानि गृह्णीतान्यानि मन्त्रवत् ॥ ६४ ॥ बायें कांध पर जनेऊ रखकर, दाहने हाथ को बाहर निकालने से द्विज 'उपवीती' कहा जाता है। दाहने कांध पर से बायें तरफ़ लटकाने से 'प्राचीन आवीती' और गले में मालासी पहनने से 'निवीती' कहा जाता है। यदि मेखला, मृगचर्म, दण्ड, जनेऊ और कमण्डलु पुराने होजायँ या टूट जायँ तो इनको जल में फेंककर और अपने गृह्यसूत्र के मन्त्रों को पढ़कर, दूसरा धारण करना चाहिए ॥ ६३-६४ ॥ केशान्तः षोडशे वर्षे ब्राह्मणस्य विधीयते । राजन्यबन्धोर्द्वाविंशे वैश्यस्य द्वयधिके ततः ॥ ६५ ॥ अमन्त्रिका तु कार्येयं स्त्रीणामावृदशेषतः । संस्कारार्थं शरीरस्य यथाकालं यथाक्रमम् ॥ ६६ ॥