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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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Page 176

३६ · मनुस्मृति । सव्येन सव्यः स्प्रष्टव्यो दक्षिणेन च दक्षिणः ॥ ७२ ॥ अध्येष्यमाणं तु गुरुर्नित्यकालमतन्द्रितः । अधीष्व भो इति ब्रूयाद्विरामोऽस्त्विति चारमेत् ॥ ७३ ॥ ब्रह्मणः प्रणवं कुर्यादादावन्ते च सर्वदा । स्रवत्यनोङ्कृतं पूर्वं पुरस्ताच्च विशीर्यति ॥ ७४ ॥ प्राक्कूलान्पर्युपासीनः पवित्रैश्चैव पावितः । प्राणायामैस्त्रिभिः पूतस्तत ओंकारमर्हति ॥ ७५ ॥ वेदाध्ययन के आरम्भ और अन्त में सदा गुरु के चरण छुवे और हाथ जोड़कर पढ़े, इसीको 'ब्रह्माञ्जलि' कहते हैं । अलग अलग हाथसे गुरु के पैर छुवे, दहने से दहना और बायेंसे बायाँ । गुरु निरालस होकर शिष्य को पहले 'हे शिष्य पढ़ो' कहकर वेद पढ़ावे और अन्तमें 'विरामोऽस्तु' (पाठ रुक जाय) कहकर विश्राम करे । वेदाध्ययन के आदि और अन्त में 'ॐ' का उच्चारण सदा करे । यदि आदि में 'ॐ' न कहे तो विद्या में प्रेम नहीं होता और अन्त में न कहे तो पढ़ी विद्या भूल जाती है । पूर्वदिशा को कुशा- सन का अग्रभाग करके, उस पर वेदाध्यायी बैठकर, तीन प्राणा- याम करके, पवित्रता से, स्वाध्याय करने के पूर्व ॐकार का उच्चा- रण करे ॥ ७२-७५ ॥ अकारं चाप्युकारं च मकारं च प्रजापतिः । वेदत्रयान्निरदुहद्भूर्भुवः स्वरितीति च ॥ ७६ ॥ त्रिभ्य एव तु वेदेभ्यः पादंपादम्दूदुहत् । तदित्यृचोऽस्याः सावित्र्याः परमेष्ठी प्रजापतिः॥ ७७॥ प्रजापति ने, अकार, उकार, मकार और भूः, भुवः, स्वः, इन तीन व्याहृतियों को ऋक्, यजु, और साम वेद से दुहकर सार