भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 177, कुल 649 में से

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पृष्ठ 177

दूसरा अध्याय । ३७ निकाला है* और तीनों वेदों से, गायत्रीऋचा के एक एक पाद को दुहा है ॥ ७६ ७७ ॥ एतदक्षरमेतां च जपन्व्याहृतिपूर्विकाम् । सन्ध्ययोर्वेदविद्विप्रो वेदपुण्येन युज्यते ॥ ७८ ॥ सहस्रकृत्वस्त्वभ्यस्य बहिरेतत्त्रिकं द्विजः । महतोऽप्येनसो मासात्त्वचेवाहिविमुच्यते ॥ ७९ ॥ एतयर्चाविसंयुक्तः काले च क्रियया स्वया । ब्रह्मक्षत्रियविड्योनिर्गर्हणां याति साधुषु ॥ ८० ॥ वेदज्ञ ब्राह्मण, प्रातः और सायंकाल समय, ॐकार, और भूः, भुवः, स्वः, इन व्याहृतियों को पूर्व लगाकर गायत्री जपने से, वेद पढ़ने का फल पाता है । जो द्विज, ग्राम वा नगर के बाहर एकान्त में, ॐकार, तीन व्याहृति और गायत्री इन तीनों का एक हजार जप करता है, वह केंचुल से सांप की भांति, महापापों से छूट जाता है । यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य गायत्री न जपता हो और समय पर अपनी अग्निहोत्रादि क्रिया न करता हो तो वह सत्पुरुषों में निन्दा पाता है ॥ ७८-८० ॥ ओंकारपूर्विकास्तिस्रो महाव्याहृतयोऽव्ययाः । त्रिपदा चैव सावित्री विज्ञेयं ब्रह्मणो मुखम् ॥ ८१ ॥ योऽधीतेऽहन्यहन्येतांस्त्रीणि वर्षाण्यतन्द्रितः । स ब्रह्म परमभ्येति वायुभूतः खमूर्तिमान् ॥ ८२ ॥

  • शतपथ ब्राह्मण ( ११ । ५ । = ) में लिखा है। प्रजापति ने सृष्टि की इच्छा की तो पहले पृथिवी, अन्तरिक्ष और आकाश उत्पन्न हुआ । उसके बाद, तीनों लोकों से, क्रम से, अग्नि, वायु और सूर्य ये प्रकाशमान तीन पदार्थ प्रकट हुए। फिर इन तीनों से क्रम से ऋक्, साम और यजुर्वेद को उत्पन्न किया। अनन्तर, तीनों वेदों का बीजस्वरूप, भूः, भुवः, स्वः, का प्रादुर्भाव हुआ। प्रथमा- ध्याय के ( २३ ) श्लोक की टिप्पणी में, वेदोत्पत्ति विषय देखो।
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