मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 178, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें३८ मनुस्मृति । एकाक्षरं परं ब्रह्म प्राणायामः परंतपः । सावित्र्यास्तु परं नास्ति मौनात्सत्यं विशिष्यते ॥ ८३ ॥ क्षरन्ति सर्वा वैदिक्यो जुहोति यजति क्रियाः । अक्षरं त्वक्षरं ज्ञेयं ब्रह्म चैव प्रजापतिः ॥ ८४ ॥ ॐकार, तीनों व्याहृति और तीन चरण की गायत्री इनको वेद का मुख जानना चाहिए । जो पुरुष, निरालस तीन वर्ष तक गायत्री जप करता है, वह अन्त में वायु तुल्य व्यापक होकर, परब्रह्म को पहुँचता है। 'ॐ' यह परब्रह्म का वाचक है, प्राणायाम बड़ा तप है, गायत्री से बढ़कर कोई मन्त्र नहीं है और मौन रहने से सत्य बोलना उत्तम होता है। वेदोक्त होम, यज्ञ, क्रिया सब नाशवान् हैं-या उनका स्वर्गादि फलभी नाशवान् है। केवल ॐकार परब्रह्म-प्रजापतिका रूपही अविनाशी जानना चाहिए ॥८१-८४॥ विधियज्ञाज्जपयज्ञो विशिष्टो दशभिर्गुणैः । उपांशु स्याच्छतगुणः साहस्त्रो मानसः स्मृतः ॥ ८५ ॥ ये पाकयज्ञाश्चत्वारो विधियज्ञसमन्विताः । सर्वे ते जपयज्ञस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ ८६ ॥ जप्येनैव तु संसिद्ध्येद्ब्राह्मणो नात्र संशयः । कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥ ८७ ॥ इन्द्रियाणां विचरतां विषयेष्वपहारिषु । संयमे यत्नमातिष्ठेद्विद्वान् यन्तेव वाजिनाम् ॥ ८८ ॥ विधियज्ञ-दर्शपौर्णमास से जपयज्ञ दशगुना श्रेष्ठ है । जिसमें पास में बैठा भी न सुने ऐसा उपांशुजप सौगुना श्रेष्ठ है और जिस में ओठ भी न हिलै, ऐसा मानसिक जप हज़ारगुना अच्छा कहा है। विधियज्ञ और चारों पाकयज्ञ-वैश्वदेव, बलिकर्म, नित्यश्राद्ध और अतिथिपूजन, जपयज्ञ के सोलहवें भाग के समान भी नहीं