मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context६२ मनुस्मृति । करना चाहिए । मनुष्यों की उत्पत्ति और पालन आदि में; माता, पिता जो दुःख सहते हैं उसका बदला सैकड़ों वर्ष सेवा से भी नहीं हो सकता ॥ २२४—२२७ ॥ तयोर्नित्यं प्रियं कुर्यादाचार्यस्य च सर्वदा । तेष्वेव त्रिषु तुष्टेषु तपः सर्वं समाप्यते ॥ २२८ ॥ तेषां त्रयाणां शुश्रूषा परमं तप उच्यते । न तैरभ्यननुज्ञातो धर्ममन्यं समाचरेत् ॥ २२६ ॥ त एव हि त्रयो लोकास्त एव त्रय आश्रमाः । त एव हि त्रयो वेदास्त एवोक्तास्त्रयोऽग्नयः ॥ २३० ॥ पिता वै गार्हपत्योऽग्निर्माताग्निर्दक्षिणः स्मृतः । गुरुराहवनीयस्तु साग्नित्रेता गरीयसी ॥ २३१ ॥ त्रिष्वप्रमाद्यन्नेतेषु त्रीँल्लोकान् विजयेद्गृही । दीप्यमानः स्ववपुषा देववद्दिवि मोदते ॥ २३२ ॥ इमं लोकं मातृभक्त्या पितृभक्त्या तु मध्यमम् । गुरुशुश्रूषया त्वेव ब्रह्मलोकं समश्नुते ॥ २३३ ॥ सर्वे तस्यादृता धर्मा यस्यैते त्रय आदृताः । अनादृतास्तु यस्यैते सर्वास्तस्याफलाः क्रियाः॥२३४ ॥ यावत्त्रयस्ते जीवेयुस्तावन्नान्यं समाचरेत् । तेष्वेव नित्यं शुश्रूषां कुर्यात् प्रियहिते रतः ॥ २३५ ॥ इसलिए सदा माता, पिता और आचार्य का प्रिय कार्य करे । इन तीनों के सन्तुष्ट होने से सब तप पूरे हो जाते हैं। इन तीनों की सेवा परम तप कहा जाता है। इनकी आज्ञा लेकर दूसरे धर्मों का आचरण करना चाहिए । ये ही तीनों लोक, पृथ्वी, अन्तरिक्ष, स्वर्ग हैं। तीनों आश्रम, तीनों वेद और तीनों अग्नि हैं। पिता गार्हपत्याग्नि, माता दक्षिणाग्नि और गुरु आहवनीयाग्नि का