मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 203, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय । ६३ स्वरूप है, ये तीनों अग्नि संसार में बड़े हैं। इन तीनों की भक्ति- सेवा से तीनों लोक गृहस्थ जीतता है। और स्वर्ग में देवताओं की भांति सुख पाता है। मातृभक्ति से यह लोक, पितृभक्ति से मध्यलोक और गुरुभक्ति से ब्रह्मलोक को पाता है। जिसने इन तीनों का आदर किया उसने सब धर्मों का पालन किया—और जिसने अनादर किया उसके सब धर्म-कर्म निष्फल हैं। जब तक , पिता, माता और गुरु जीवित रहें तब तक इनकी सेवा में विशेष लगा रहे ॥ २२८—२३५ ॥ तेषामनुपरोधेन पारत्र्यं यद्यदाचरेत् । तत्तन्निवेदयेत्तेभ्यो मनोवचनकर्मभिः ॥ २३६ ॥ त्रिष्वेतेष्विति कृत्यं हि पुरुषस्य समाप्यते । एष धर्मः परः साक्षादुपधर्मोऽन्य उच्यते ॥ २३७ ॥ श्रद्दधानः शुभां विद्यामाददीतावरादपि । अन्त्यादपि परं धर्मं स्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि ॥ २३८ ॥ विषादप्यमृतं ग्राह्यं बालादपि सुभाषितम् । अमित्रादपि सद्वृत्तममेध्यादपि काञ्चनम् ॥ २३६ ॥ स्त्रियो रत्नान्यथो विद्या धर्मः शौचं सुभाषितम् । विविधानि च शिल्पानि समादेयानि सर्वतः ॥२४०॥ इसके सिवा जो कर्म करे वह इनको निवेदन करदेवे। इन तीनों की सेवा से, पुरुष के कर्तव्य पूरे पड़जाते हैं। यह मुख्य धर्म है और गौणधर्म माना जाता है। श्रद्धामय पुरुष उत्तम विद्याओं को हीनजाति से भी सीखे और चण्डाल से भी लोकमर्यादा सीखे और हीनकुल से भी सुशील स्त्री का विवाह करे। विष से भी अमृत और बालक से भी हित वचन ग्रहण करले। शत्रु से भी सदाचार और अपवित्र में से भी सुवर्ण निकाल लेवे। स्त्री, रत्न विद्या, धर्म, शौच, अच्छे वचन और भांति भांति की दस्तकारी आदि सब से सीख लेवे ॥ २३६—२४० ॥