मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextतीसरा अध्याय । ७१ ज्ञातिभ्यो द्रविणं दत्त्वा कन्यायै चैव शक्तितः । कन्याप्रदानं स्वाच्छन्द्यादासुरो धर्म उच्यते ॥ ३१ ॥ इच्छयान्योन्यसंयोगः कन्यायाश्च वरस्य च । गान्धर्वः स तु विज्ञेयो मैथुन्यः कामसम्भवः ॥ ३२ ॥ हत्वा छित्त्वा च भित्त्वा च क्रोशन्तीं रुदतीं गृहात् । प्रसह्य कन्याहरणं राक्षसो विधिरुच्यते ॥ ३३ ॥ सुप्तां मत्तां प्रमत्तां वा रहो यत्रोपगच्छति । स पापिष्ठो विवाहानां पैशाचश्चाष्टमोऽधमः ॥ ३४ ॥ 'तुम दोनों साथ धर्माचरण करो' ऐसा कहकर वर कन्या का पूजन करके जो कन्यादान होता है उसको 'प्राजापत्य विवाह' कहते हैं। वर के माता पिता और कन्या को यथाशक्ति धन देकर जो इच्छापूर्वक कन्यादान है उसको 'आसुर विवाह' कहते हैं। कन्या और वर की इच्छा से जो संयोग होता है उसको गान्धर्व विवाह कहते हैं, यह कामवश भोगमात्र के लिए है, धर्मार्थ नहीं है। मारकर, दुःख देकर, रोती हुई कन्या को ज़बरदस्ती हरलेजाना, 'राक्षस विवाह' कहलाता है। सोती, नशे में और बेसुध कन्या के साथ एकान्त में संभोग करना 'पैशाच विवाह' होता है। यह महाअधम और पापपूर्ण विवाह है ॥ ३०-३४ ॥ अद्भिरेव द्विजाग्र्याणां कन्यादानं विशिष्यते । इतरेषां तु वर्णानामितरेतरकाम्यया ॥ ३५ ॥ यो यस्यैषां विवाहानां मनुना कथितो गुणः । सर्वं शृणुत तं विप्राः सम्यक् कीर्तयतो मम ॥ ३६ ॥ वर के हाथ में जल देकर कन्यादान ब्राह्मणों के लिए उत्तम पक्ष है। दूसरे वर्णों में इच्छानुसार विनाजल, वचनमात्र से ही विवाह होजाता है। भृगु ने ब्राह्मणों से कहा-इन सब विवाहों में जिसका जो गुण मनु ने कहा है वह आप लोग सुनिए ॥ ३५-३६ ॥