BharatKosha
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 224 of 649

Read in context
Page 224

८४ मनुस्मृति । शासन, स्थान, शय्या, सेना और अरदली में जाना, इन सबका उत्तम अतिथि उत्तम, मध्यम को मध्यम और साधारण से उसके लायक बर्ताव करना चाहिए । वैश्वदेव के बाद जो कोई अतिथि आपड़े तो उसको भी भोजन बनाकर खिलावे, पाक में से बलि न देवे । विप्र को भोजनार्थ अपना कुल, गोत्र न बतलाना चाहिए । यदि बतलावे तो वह, वान्ताशी 'उगलन खानेवाला' कहा जाता है । ब्राह्मण के घर क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अपना मित्र, जातीय पुरुष और गुरु ये सब अतिथि नहीं माने जाते । अगर क्षत्रिय अतिथि बनकर आवे तो ब्राह्मणभोजन के बाद उसको भी खूब खिला देवे ॥ १०७-१११ ॥ वैश्यशूद्रावपि प्राप्तौ कुटुम्बेऽतिथिधर्मिणौ । भोजयेत्सह भृत्यैस्तावानृशंस्यं प्रयोजयन् ॥ ११२ ॥ इतरानपि सख्यादीन् संप्रीत्या गृहमागतान् । संस्कृत्यान्नं यथाशक्ति भोजयेत्सह भार्यया ॥ ११३ ॥ सुवासिनीः कुमारीश्च रोगिणो गर्भिणीस्तथा । अतिथिभ्योऽग्र एवैतान् भोजयेदविचारयन् ॥ ११४ ॥ गृहस्थ ब्राह्मण के घर वैश्य, शूद्र भी अतिथि रूप से आजाय तो उनको भी नौकरों के साथ खिला देना चाहिए । और भी मित्र-सम्बन्धी आदि प्रेम से अपने घर आवें तो स्त्री के साथ उनको भी अच्छा भोजन देना चाहिए । नवीन विवाहवाली, कन्या, रोगी और गर्भवती इनको अतिथि के पहिले ही बिना विचार किये भोजन करा देना चाहिए ॥ ११२-११४ ॥ अदत्त्वा तु य एतेभ्यः पूर्वं भुङ्क्ते विचक्षणः । स भुञ्जानो न जानाति श्वगृध्रैर्जग्धिमात्मनः॥११५॥ भुक्तवत्स्वथ विप्रेषु स्वेषु भृत्येषु चैव हि । भुञ्जीयातां ततः पश्चादवशिष्टं तु दम्पती ॥ ११६ ॥

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित) · Page 224 of 649 · BharatKosha