मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 225, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय। ८५ देवानृषीन्मनुष्यांश्च पितॄन्गृह्याश्च देवताः । पूजयित्वा ततः पश्चाद्गृहस्थःशेषभुग्भवेत् ॥११७॥ अघं स केवलं भुङ्क्ते यः पचत्यात्मकारणात् । यज्ञशिष्टाशनं ह्येतत्सतामन्नं विधीयते ॥ ११८ ॥ इस प्रकार सबको भोजन दिये बिना जो पहले आपही खा लेता है। मरने पर उसके मांस को कुत्ते और गीध खाते हैं । ब्राह्मण, अतिथि, सम्बन्धी आदि को खिलाकर पीछे बचा अन्न आप और स्त्री खावे । देवता, ऋषि, मनुष्य, पितर और घर के पूज्य देवताओं का पूजन करके शेष अन्न गृहस्थ को खाना चा- हिए । जो अपनेही लिए भोजन तैयार करता है वह केवल पाप को ही खाता है, क्योंकि उत्तम पुरुषों को पञ्च महायज्ञ से बचे अन्न काही भोजन फलदायक होता है ॥ ११५-११८ ॥ राजर्त्विक्स्नातकगुरून् प्रियश्वशुरमातुलान् । अर्हयेन्मधुपर्केण परिसंवत्सरात्पुनः ॥ ११९ ॥ राजा च श्रोत्रियश्चैव यज्ञकर्मण्युपस्थितौ । मधुपर्केण संपूज्यौ न त्वयज्ञ इति स्थितिः ॥ १२० ॥ सायं त्वन्नस्य सिद्धस्य पत्न्यमन्त्रं बलिं हरेत् । वैश्वदेवं हि नामैतत्सायं प्रातर्विधीयते ॥ १२१ ॥ राजा, ऋत्विक्, स्नातक, गुरु, मित्र, जामाता, प्रिय पुरुष और श्वशुर, मामा, एक साल के बीतने पर घर आवें तो मधुपर्क से पूजन करना चाहिए। राजा और वेदज्ञ ब्राह्मण साल के भीतर भी यदि यज्ञ के मौक़े पर आजांयें तो मधुपर्क से पूजन करना चाहिए। अगर यज्ञमें न आवें तो न पूजन करे। स्त्री को शाम को पकाये अन्न में से बिना मन्त्र पढ़े ही बलि देना चाहिए । इस बलि को वैश्वदेव कहते हैं । यह सायंकाल और प्रातःकाल करना चाहिए ॥ ११९-१२१ ॥