मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextतीसरा अध्याय । १०५ देवे । श्राद्ध में दौहित्र, कुतप और तिल ये तीन पवित्र होते हैं। पवित्रता, क्रोध न करना और धीरज इन तीन बातों की प्रशंसा है। सब अन्न को खूब गरम रक्खे और उसको ब्राह्मण मौन होकर भोजन करें। यदि देनेवाला भोजन के गुण पूछे तो भी ब्राह्मणों को न कहना चाहिए। अर्थात् भोजन के समय व्यर्थ बकवाद न करना चाहिए ॥ २३४-२३६ ॥ यावदुष्णं भवत्यन्नं यावदश्नन्ति वाग्यताः । पितरस्तावदश्नन्ति यावन्नोक्ता हविर्गुणाः ॥ २३७ ॥ यद्वेष्टितशिरा भुङ्क्ते यद्भुङ्क्ते दक्षिणामुखः । सोपानत्कश्च यद्भुङ्क्ते तद्वै रक्षांसि भुञ्जते ॥ २३८॥ चाण्डालश्च वराहश्च कुक्कुटः श्वा तथैव च। रजस्वला च षण्ढश्च नेक्षरन्नश्नतो द्विजान् ॥ २३६ ॥ होमे प्रदाने भोज्ये च यदेभिरभिवीक्ष्यते । दैवे कर्मणि पित्र्ये वा तद्गच्छत्ययथातथम् ॥ २४० ॥ घ्राणेन शूकरो हन्ति पक्षवातेन कुक्कुटः । श्वा तु दृष्टिनिपातेन स्पर्शेनावरवर्णजः ॥ २४१ ॥ जबतक अन्न गरम रहता है और जबतक मौन होकर ब्राह्मण भोजन करते हैं और भोजन के गुण नहीं बयान किए जाते तबतक ही पितर अन्नका ग्रहण करते हैं। जो शिर में वस्त्र बांधकर द- क्षिणमुख होकर और जूता पहनकर खाता है, ऐसे भोजन का फल राक्षसों को पहुँचता है। चाण्डाल, शूकर, मुरगा, कुत्ता, रजस्वला स्त्री, और नपुंसक ये लोग भोजन करते हुए ब्राह्मणों को न देखने पावें। हवन में, दान में, ब्राह्मणभोजन में, देवकर्म में वा पितृकर्म में यदि चाण्डाल आदि की नज़र पड़े तो वह कर्म निष्फल होजाता है। शूकर सूंघने से, मुरगा पंख की हवा से, कुत्ता देखने से और शूद्र स्पर्श से श्राद्ध के अन्न को दूषित करदेता है ॥ २३७-२४१॥ १४