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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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१०६ मनुस्मृति । खञ्जो वा यदि वा काणो दातुः प्रेष्योऽपि वा भवेत् । हीनातिरिक्तगात्रो वा तमप्यपनयेत् पुनः ॥ २४२ ॥ ब्राह्मणं भिक्षुकं वापि भोजनार्थमुपस्थितम् । ब्राह्मणैरभ्यनुज्ञातः शक्तितः प्रतिपूजयेत् ॥ २४३ ॥ श्राद्धकर्ता का सेवक भी यदि लूला, काना, या कम ज्यादा अङ्गवाला हो तो उसे भी ब्राह्मणभोजन के समय हटा देना चा- हिए। उस समय यदि कोई ब्राह्मण वा भिक्षुक भोजन के लिए आजाय तो ब्राह्मणों की आज्ञा से उसका भी भरशक आदर करना चाहिए ॥ २४२-२४३ ॥ सार्ववर्णिकमन्नाद्यं संनीयाप्लाव्य वारिणा । समुत्सृजेद्भुक्तवतामग्रतो विकिरेद्भुवि ॥ २४४ ॥ असंस्कृतप्रमीतानां त्यागिनां कुलयोषिताम् । उच्छिष्टं भागधेयं स्याद्दर्भेषु विकिरश्च यः ॥ २४५ ॥ उच्छेषणं भूमिगतमजिह्मस्याशठस्य च । दासवर्गस्य तत्पित्र्ये भागधेयं प्रचक्षते ॥ २४६ ॥ भोजन से बचा हुआ सब प्रकार का अन्न इकट्ठा करके जल से गीला करे और ब्राह्मणों के आगे रक्खे और थोड़ासा कुशों पर छींट देवे । यह कुशों पर बिखेरा और जूॅठा बचा अन्न बिना सं- स्कार मृत बालक, त्यागी और कुलस्त्रियों का माना जाता है। श्राद्ध में भूमि पर पड़ा जूॅठा अन्न सीधे सरल स्वभाव दासों का भाग है ॥ २४४-२४६ ॥ आसपिण्डक्रियाकर्म द्विजातेः संस्थितस्य तु । अद्दैवं भोजयेच्छ्राद्धं पिण्डमेकं तु निर्वपेत् ॥ २४७ ॥ स ह पिण्डक्रियायां तु कृतायामस्य धर्मतः । अनयैवावृता कार्यं पिण्डनिर्वपणं सुतैः ॥ २४८ ॥

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