मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context⸱तीसरा अध्याय । १०७ श्राद्धं भुक्त्वा य उच्छिष्टं वृषलाय प्रयच्छति । स मूढो नरकं याति कालसूत्रमवाक्शिराः ॥ २४६ ॥ श्राद्धभुग्वृषलीतल्पं तदहर्योऽधिगच्छति । तस्याः पुरीषे तन्मासं पितरस्तस्य शेरते ॥ २५० ॥ द्विजातियों का जबतक सपिण्डीकरण न हो, तबतक उसका श्राद्ध वैश्वदेवरहित करे और उसमें एक ब्राह्मण को भोजन और एक पिण्ड देना चाहिए । मृत पुरुष का सपिण्डीकरण होजाने पर अमावास्या की श्राद्धविधि के अनुसार ही पुत्रों को पिण्डदान करना चाहिए । भोजन के बाद बचा जूॅठा अन्न जो शूद्र को देता है, वह मूर्ख नीचे शिर होकर कालसूत्र नरक को जाता है । जो श्राद्ध में भोजन करके उस दिन रात में स्त्रीसंग करता है, उसके पितर एक मासतक उसी स्त्री की विष्ठा में सोते हैं ॥ २४७-२५० ॥ पृष्ट्वा स्वदितमित्येवं तृप्तानाचामयेत्ततः । आचान्तांश्चानुजानीयादभितो रम्यतामिति ॥ २५१ ॥ स्वधास्त्वित्येव तं ब्रूयुर्ब्राह्मणास्तदनन्तरम् । स्वधाकारः परा ह्याशीः सर्वेषु पितृकर्मसु ॥ २५२ ॥ ततो भुक्तवतां तेषामन्नशेषं निवेदयेत् । यथा ब्रूयुस्तथा कुर्यादनुज्ञातस्ततो द्विजैः ॥ २५३ ॥ तृप्त हुए ब्राह्मणों से 'स्वदितम्' आपने खूब भोजन किया ? ऐसा पूंछे, फिर आचमन कराकर 'अभितो रम्यताम्' इच्छानु- सार पधारिए, यों कहकर विदा करे । उसके बाद ब्राह्मण 'स्वधास्तु' ऐसा कहें, क्योंकि सब पितृकर्मों में यह कहना परम आशीर्वाद मानाजाता है। भोजन किए ब्राह्मणों से जो अन्न बचा हो उसको निवेदन करे और उन लोगों की आज्ञानुसार उसकी व्यवस्था करे ॥ २५१-२५३ ॥