मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context११२ मनुस्मृति । रोहिणी ) श्राद्ध करने से, सब कामना पूरी होती हैं। और विषम तिथि, नक्षत्रों में (प्रतिपदा, तृतीया, अश्विनी, कृत्तिका आदि) श्राद्ध करने से, बहुत सन्तान होती है। जैसे, शुक्लपक्ष से कृष्णपक्ष श्राद्ध में श्रेष्ठ माना जाता है, वैसेही पूर्वाह्न से अपराह्न-दोपहर बाद, काल उत्तम गिना जाता है ॥ २७६-२७८ ॥ प्राचीनावीतिना सम्यगपसव्यमतन्द्रिणा । पित्र्यमानिधनात्कार्यं विधिवद्दर्भपाणिना ॥ २७९ ॥ रात्रौ श्राद्धं न कुर्वीत राक्षसी कीर्तिता हि सा । सन्ध्ययोरुभयोश्चैव सूर्ये चैवाचिरोदिते ॥ २८० ॥ अनेन विधिना श्राद्धं त्रिरब्दस्येह निर्वपेत् । हेमन्तग्रीष्मवर्षासु पाञ्चयज्ञिकमन्वहम् ॥ २८१ ॥ हाथ में कुश लेकर, शास्त्रविधि से मृत्यु तक श्राद्ध किया करे। रात्रि में श्राद्ध न करे, क्योंकि वह राक्षसी समय है। और सूर्योदय, सूर्यास्त समय और सूर्योदय के कुछ काल बाद भी श्राद्ध न करना चाहिए। इस विधि के अनुसार, गृहस्थ यदि प्रतिमास श्राद्ध न करसके तो वर्ष में, हेमन्त, ग्रीष्म और वर्षार्ऋतु में श्राद्ध और नित्य पञ्चमहायज्ञ करे ॥ २७९-२८१ ॥ न पैतृयज्ञियो होमो लौकिकेऽग्नौ विधीयते । न दर्शेन विना श्राद्धमाहिताग्नेर्द्विजन्मनः ॥ २८२ ॥ यदेव तर्पयत्यद्भिः पितॄन् स्नात्वा द्विजोत्तमः । तेनैव कृत्स्नमाप्नोति पितृयज्ञक्रियाफलम् ॥ २८३ ॥ वसून् वदन्ति तु पितॄन् रुद्रांश्चैव पितामहान् । प्रपितामहांस्तथादित्याञ्छुतिरेषा सनातनी ॥ २८४ ॥ विघसाशी भवेन्नित्यं नित्यं वामृतभोजनः । विघसो भुक्तशेषं तु यज्ञशेषं तथामृतम् ॥ २८५ ॥