मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय। १११ यत्किञ्चिन्मधुना मिश्रं प्रदद्यात्तु त्रयोदशीम् । तदप्यक्षयमेव स्याद्वर्षासु च मघासु च॥ २७३ ॥ अपि नः स कुले जायाद्यो नो दद्यात् त्रयोदशीम् । पायसं मधुसर्पिभ्यां प्राक्छाये कुञ्जरस्य च॥ २७४ ॥ यद्यद्ददाति विधिवत् सम्यक्श्रद्धासमन्वितः । तत्तत्पितॄणां भवति परत्रानन्तमक्षयम् ॥ २७५ ॥ कालाशाक, महाशल्क-मछली का भेद, गेंडा, लाल बकरा, शहद और सब प्रकार के मुनिअन्नों से, अनन्त वर्षों तक पितर तृप्त रहते हैं। वर्षार्ऋतु, मघानक्षत्र और त्रयोदशी तिथिको कोई भी पदार्थ मधु मिलाकर पितरों के निमित्त देने से, उनको अक्षय तृप्ति होती है। पितर आशा करते हैं-हमारे कुल में कोई ऐसा हो जो त्रयोदशी को या हाथी की छाया पूर्व दिशा में पड़े ऐसे समय, घी, मधु से मिले हुए पायस-खीर से, हमको तृप्त करें। भक्ति और श्रद्धा से विधिपूर्वक जो कुछ पितरों को दिया जाता है, उसका अनन्त फल उनको परलोक में पहुँचता है ॥ २७२-२७५ ॥ कृष्णपक्षे दशम्यादौ वर्जयित्वा चतुर्दशीम् । श्राद्धे प्रशस्तास्तिथयो यथैमा न तथेतराः ॥ २७६ ॥ युक्षु कुर्वन् दिनर्क्षेषु सर्वान् कामान् समश्नुते । अयुक्षु तु पितृन्सर्वान् प्रजां प्राप्नोति पुष्कलाम् ॥२७७॥ यथा चैवापरः पक्षः पूर्वपक्षाद्विशिष्यते । तथा श्राद्धस्य पूर्वाह्नादपराह्नो विशिष्यते ॥ २७८ ॥ चतुर्दशी को छोड़कर, कृष्णपक्ष की दशमी से अमावास्या तक की तिथि पितृकार्य के लिए जैसी पवित्र है वैसी दूसरी नहीं है। समतिथि और समनक्षत्रों में (जैसा द्वितीया, चतुर्थी, भरणी,