मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextचौथा अध्याय । १२१ नोपगच्छेत् प्रमत्तोऽपि स्त्रियमार्तवदर्शने । समानशयने चैव न शयीत तया सह ॥ ४० ॥ उदय और अस्त होतेहुए सूर्य को जानकर कभी न देखना चाहिए । और ग्रहणसमय में, जल में और दोपहर में भी न देखना चाहिए। बछड़ा बांधने की रस्सी को लांघना न चाहिए, वर्षा होते समय रास्ते में दौड़ना और जल में अपना मुख देखना न चाहिए। यह धर्मशास्त्र की आज्ञा है। मिट्टी का टीला, गौ, देवमूर्ति, ब्राह्मण, घी, शहद, चौराहा और वट, पीपल वगैरह वृक्ष, मार्ग में जातेहुए देख पड़ें तो उनको दाहिनी तरफ़ करके जाना चाहिए। कामातुर पुरुष को भी रजस्वला स्त्री के साथ भोग न करना चाहिए और न एक शय्या पर सोना ही चाहिए ॥ ३७-४०॥ रजसाभिप्लुतां नारीं नरस्य ह्युपगच्छतः । प्रज्ञा तेजो बलं चक्षुरायुश्चैव प्रहीयते ॥ ४१ ॥ तां विवर्जयतस्तस्य रजसा समभिप्लुताम् । प्रज्ञा तेजो बलं चक्षुरायुश्चैव प्रवर्धते ॥ ४२ ॥ नाश्नीयाद्भार्यया सार्धं नैनामीक्षेत चाश्नतीम् । क्षुवतीं जृम्भमाणां वा न चासीनां यथासुखम् ॥४३॥ नाञ्जयन्तीं स्वके नेत्रे न चाभ्यक्तामनावृताम् । न पश्येत्प्रसवन्तीं च तेजस्कामो द्विजोत्तमः ॥ ४४ ॥ जो पुरुष रजस्वला स्त्री के साथ भोग करता है उसकी बुद्धि, तेज, बल, नेत्र और आयु नष्ट होती है। जो उससे बचा रहता है उसकी बुद्धि, तेज, बल, नेत्र और आयु बढ़ते हैं। स्त्री और पुरुष साथ बैठकर भोजन न करें। स्त्री को भोजन करती, छींकती, जंभाई लेती और मनमानी बैठी हुई कभी न देखना चाहिए। अंजन लगाती, तैल मलती, नंगी और बालक पैदा होता हो तो उस समय भी न देखे ॥ ४१-४४ ॥ १६