भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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१२२ मनुस्मृति । नान्नमद्यादेकवासा न नग्नः स्नानमाचरेत् । न मूत्रं पथि कुर्वीत न भस्मनि न गोव्रजे ॥ ४५ ॥ न फालकृष्टे न जले न चित्यां न च पर्वते । न जीर्णदेवायतने न वल्मीके कदाचन ॥ ४६ ॥ न ससत्त्वेषु गर्तेषु न गच्छन्नपि च स्थितः । न नदीतीरमासाद्य न च पर्वतमस्तके ॥ ४७ ॥ गृहस्थ को एक वस्त्र से भोजन, नंगा होकर स्नान, मार्ग में, राख के ढेर पर और गोशाला में पेशाब न करना चाहिए । हल से जोती जमीन में, जल में, चिता में, पर्वत में, पुराने देव- मन्दिर में और बामी पर पेशाब कभी न करना चाहिए। जीवजन्तु वाले गढों में, चलतेहुए, खड़ा होकर, नदी के किनारे पर और पहाड़ की चोटी पर पेशाब न करना चाहिए ॥ ४५-४७ ॥ वाय्वग्निविप्रमादित्यमपः पश्यंस्तथैव गाः । न कदाचन कुर्वीत विण्मूत्रस्य विसर्जनम् ॥ ४८ ॥ तिरस्कृत्योच्चरेत्काष्ठलोष्ठपत्रतृणादिना । नियम्य प्रयतो वाचं संवीताङ्गोऽवगुण्ठितः ॥ ४९ ॥ मूत्रोच्चारसमुत्सर्गं दिवा कुर्यादुदङ्मुखः । दक्षिणाभिमुखो रात्रौ सन्ध्ययोश्च यथा दिवा ॥ ५० ॥ छायायामन्धकारे वा रात्रावहनि वा द्विजः । यथा सुखमुखः कुर्यात्प्राणबाधाभयेषु च ॥ ५१ ॥ वायु, अग्नि, ब्राह्मण, सूर्य, जल और गौ को सामने देखकर कभी मल-मूत्र का त्याग न करना चाहिए। शरीर और शिर को वस्त्र से ढँककर, मौन होकर, लकड़ी, ढेला, वृक्ष का गिरा पत्ता या तिनका से भूमि को ढककर मल-मूत्र त्याग करने को बैठना