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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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चौथा अध्याय । १४१ गुरु आदि वृद्ध-मान्य पुरुष घर आवें तो उनको प्रणाम करना। बैठने को आसन देना, हाथ जोड़कर पास बैठना और जाने लगें तो कुछ दूर पहुंचाने को जाना चाहिए। गृहस्थ को आलस्य छोड़ कर, श्रुति और स्मृति में कहे हुए कर्म वेद पाठ, व्रत आदि और नित्य कर्म और धर्म का मूलभूत सदाचार को सदा करना चाहिए ॥ १५४-१५५ ॥ आचाराल्लभते ह्यायुराचारादीप्सिताः प्रजाः । आचाराद्धनमक्षय्यमाचारो हन्त्यलक्षणम् ॥ १५६ ॥ दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः । दुःखभागी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च ॥ १५७ ॥ सर्वलक्षणहीनोऽपि यः सदाचारवान्नरः । श्रद्दधानोऽनसूयश्च शतं वर्षाणि जीवति ॥ १५८ ॥ सदाचार के पालन से दीर्घ आयु, मनचाही सन्तान और अ- क्षय धन मिलता है । और आचार से ही कुलक्षणों का विनाश होता है। दुराचारी पुरुष की निन्दा संसार में होती है। वह सदा दुःख पाता है, रोगी रहता है और कम उमर पाता है। जो पुरुष दूसरे शुभ लक्षणों से रहित भी हो, पर सदाचार में लगा रहता हो, शास्त्र में भक्ति रखता हो, ईर्षारहित हो तो उसकी उमर सौ वर्ष की होती है ॥ १५६-१५८ ॥ यद्यत्परवशं कर्म तत्तद्यत्नेन वर्जयेत् । यद्यदात्मवशं तु स्यात्तत्तत्सेवेत यत्नतः ॥ १५६ ॥ सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम् । एतद्विद्यात्समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः ॥ १६० ॥ यत्कर्म कुर्वतोऽस्य स्यात्परितोषोऽन्तरात्मनः । तत्प्रयत्नेन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत् ॥ १६१ ॥