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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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Page 282

१४२ मनुस्मृति ।

आचार्यं च प्रवक्तारं पितरं मातरं गुरुम् । न हन्याद्ब्राह्मणान्गाश्च सर्वांश्चैव तपस्विनः ॥ १६२ ॥ नास्तिक्यं वेदनिन्दां च देवतानां च कुत्सनम् । द्वेषं दम्भं च मानं च क्रोधं तैक्ष्ण्यं च वर्जयेत् ॥ १६३ ॥

संसार में जो जो काम दूसरे के अधीन हों उनको यत्न से छोड़ देना चाहिए। और जो जो काम अपने से होनेवाले हों उनको यत्न से करना चाहिए। जो पराधीन विषय हैं उन सबों में दुःख और जो स्वाधीन हैं उनमें सुख होता है। यही सुख दुःख का संक्षेप में लक्षण है। जिस कर्म के करने से पुरुष की आत्मा सुख संतोष पावे उसी कर्म को यत्न से करना चाहिए और जिसको करने से मन को दुःख पहुँचे वह काम छोड़ देना चाहिए। यज्ञो- पवीत देनेवाला आचार्य, वेद व्याख्या करनेवाला, पिता, माता, गुरु, गौ और सब भांति के तपस्वियों के चित्त दुखानेवाला कोई काम न करना चाहिए। स्वर्ग, ईश्वर आदि को न माननेवाली ना- स्तिक बुद्धि, वेद निंदा, देवताओं की निंदा, द्वेष, दंभ, अभिमान, क्रोध और क्रूरता को छोड़ देना चाहिए ॥ १५६-१६३ ॥

परस्य दण्डं नोद्यच्छेत्क्रुद्धो नैव निपातयेत् । अन्यत्र पुत्राच्छिष्याद्वा शिष्ट्यर्थं ताडयेत्तु तौ ॥ १६४॥ ब्राह्मणायोवगुर्येव द्विजातिर्वधकाम्यया । शतं वर्षाणि तामिस्रे नरके परिवर्तते ॥ १६५ ॥ ताडयित्वा तृणेनापि संरम्भान्मतिपूर्वकम् । एकविंशत्तमाञ्जातीः पापयोनिषु जायते ॥ १६६ ॥ अयुध्यमानस्योत्पाद्य ब्राह्मणस्यासृगङ्गतः । दुःखं सुमहदाप्नोति प्रेत्याप्राज्ञतया नरः ॥ १६७ ॥