मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextचौथा अध्याय । १४३ शोणितं यावतः पांसून्संगृह्णाति महीतलात् । तावतोऽब्दानमुत्रान्यै शोणितोत्पादकोर्द्यते ॥ १६८ ॥ क्रोध में आकर किसीको मारने को लकड़ी न उठाना । पुत्र और शिष्य के सिवा दूसरे को लकड़ी से न मारना । परन्तु शिक्षा के लिए पुत्र और शिष्य दोनों को मारना उचित है । गृहस्थ यदि ब्राह्मण को मारने की इच्छा से लकड़ी उठावे तो सौ वर्ष तामिस्र नरक में लुढ़कता है । यदि ब्राह्मण को क्रोधवश तिनके से भी जानकर मारे तो इक्कीस जन्म तक पाप योनि में जन्म लेना पड़ता है । जो पुरुष, ब्राह्मण लड़ता न हो तो भी उसके शरीर से रुधिर निकालता है वह अपनी भूल से मरने के बाद बड़ा दुःख पाता है । ब्राह्मण के शरीर का रुधिर, भूमि में जितने रजकणों को सान लेता है उतने वर्ष तक उस मनुष्य को परलोक में रुधिर निकालने वाले जीव काट काट कर दुःख देते हैं ॥ १६४-१६८ ॥ न कदाचिद् द्विजे तस्माद्विद्वानवगुरेदपि । न ताडयेत्तृणेनापि न गात्रात्स्रावयेदसृक् ॥ १६६ ॥ अधार्मिको नरो योहि यस्य चाप्यनृतं धनम् । हिंसारतस्य यो नित्यं नेहासौ सुखमेधते ॥ १७० ॥ इस लिए बुद्धिमान पुरुष को कभी ब्राह्मण के सामने लकड़ी न उठाना चाहिए । उसको तिनके से भी न मारना । उसके शरीर में रुधिर न निकालना चाहिए । अधर्मी-पापी पुरुष, झूठी गवाही देकर धन लेनेवाला, और नित्य हिंसा में लगा हुआ इस लोक में सुख नहीं पाते वे सदा दुःखी रहते हैं ॥ १६६-१७० ॥ न सीदन्नपि धर्मेण मनोऽधर्मे निवेशयेत् । अधार्मिकाणां पापाना माशु पश्यन् विपर्ययम् ॥१७१॥ नाधर्मश्चरितो लोके सद्यः फलति गौरिव ।