मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextचौथा अध्याय । १४६ स लिङ्गिनां हरत्येनस्तिर्यग्योनौ च जायते ॥ २०० ॥ परकीयनिपानेषु न स्नायाच्च कदाचन । निपानकर्त्तुः स्नात्वा तु दुष्कृतांशेन लिप्यते ॥ २०१ ॥ यानशय्यासनान्यस्य कूपोद्यानगृहाणि च । अदत्तान्युपभुञ्जान एनसः स्यात्तुरीयभाक् ॥ २०२ ॥ ऐसे कपटी ब्राह्मणों की लोक परलोक दोनों में विद्वान् ब्राह्मण निन्दा करते हैं और उनके कपटव्रतों का फल राक्षसों को पहुँचता है। जो पुरुष जिस वर्ण वा आश्रम से सम्बन्ध नहीं रखता, पर उसके चिह्नों को जीविका के लिये धारण करता है, वह उन वर्णा- श्रमवालों के पाप को ग्रहण करता है और अन्त में पक्षियोनि को प्राप्त होता है। किसीके तालाब, पौशाला आदि में कभी स्नान न करना। स्नान करने से, उसके मालिक के चतुर्थांश पाप का वह भागी होता है। सवारी, शय्या, आसन, कुआं, बगीचा और घर बिना दिये जो दूसरे का भोगता है वह उसके स्वामी का चौथाई पाप का भागी होता है ॥ १६६-२०२ ॥ नदीषु देवखातेषु तडागेषु सरःसु च । स्नानं समाचरेन्नित्यं गर्तप्रस्रवणेषु च ॥ २०३ ॥ यमान्सेवेत सततं न नित्यं नियमान् बुधः । यमान्पतत्यकुर्वाणो नियमान् केवलान् भजन् ॥२०४॥ नाश्रोत्रियतते यज्ञे ग्रामयाजिकृते तथा । स्त्रिया क्लीबेन च हुते भुञ्जीत ब्राह्मणः क्वचित् ॥ २०५ ॥ नदी, देवताओं के लिये बने जलाशय, सरोवर, सोता झरना आदि में नित्य स्नान करना चाहिए। विद्वान् गृहस्थ नित्य नियम का ही पालन न करें, बल्कि यमोंका भी पालन करे। क्योंकि यमों को न करके केवल नियमोंके ही पालन से वह पतित होजाता