भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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पृष्ठ 288

१४८ मनुस्मृति । लोक में दोनों का अशुभकारक होता है। जैसे पत्थर की नाव से तैरता हुआ पुरुष जल में डूब जाता है, वैसेही मूर्खदाता और लेने वाला नरक में डूबते हैं ॥ १६२-१६४ ॥ धर्मध्वजी सदा लुब्धश्छाद्मिको लोकदम्भकः । वैडालव्रतिको ज्ञेयो हिंस्रः सर्वाभिसन्धकः ॥ १६५॥ अधोदृष्टिर्नैकृतिकः स्वार्थसाधनतत्परः । शठो मिथ्या विनीतश्च वकव्रतचरो द्विजः ॥ १६६ ॥ ये वकव्रतिनो विप्रा ये च मार्जारलिङ्गिनः । ते पतन्त्यन्धतामिस्रे तेन पापेन कर्मणा ॥ १६७ ॥ जो संसार को छलने के लिये धर्माचरण करते हैं, लोगों को धोखा देते हैं, दूसरे की बुराई में लगे रहते हैं, लोभी हैं और दूसरे के गुणों को न सहकर लड़ा करते हैं, ऐसे पुरुषों को 'वैडाल व्रतिक' कहते हैं। जो सदा नीची दृष्टिरखतेहैं, शान्तभाव से रहते हैं, मन में मतलब गांठा करते हैं, जड़ हैं और झूठा विनय दिखाते हैं, ऐसे पुरुषों को वकभक्त-बगलाभगत कहतेहैं, जो वैडालव्रतिक, वकभक्त आदि हैं वे सब अपने पापवश 'अन्धतामिस्र' नरक में पड़ते हैं ॥ १६५-१६७ ॥ न धर्मस्यापदेशेन पापं कृत्वा व्रतं चरेत् । व्रतेन पापं प्रच्छाद्य कुर्वन् स्त्रीशूद्रदम्भनम् ॥ १६८ ॥ कोई पाप करके, उसका प्रायश्चित्त करते हुए यह न कहै कि यह प्रायश्चित्त नहीं, किन्तु धर्मार्थ करते हैं। ऐसा कहकर लोक को छलना न चाहिए ॥ १६८ ॥ प्रेत्येह चेदृशा विप्रा गर्ह्यन्ते ब्रह्मवादिभिः । छद्मना चरितं यच्च व्रतं रक्षांसि गच्छति ॥ १६६ ॥ अलिङ्गी लिङ्गिवेषेण यो वृत्तिमुपजीवति ।