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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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Page 320

१८० मनुस्मृति । द्रव्याणां चैव सर्वेषां शुद्धिराप्लवनं स्मृतम्। प्रोक्षणं संहतानां च दारवाणां च तक्षणम् ॥११५॥ पदार्थ-शुद्धि। सुवर्ण आदि तेजस पदार्थ, मणि और सब पत्थर के पदार्थों की शुद्धि राख, जल और मिट्टी से होती है। जिस में किसी भांति का लेप न हो ऐसा सोना का पात्र, शंख, पत्थर और चांदी का पात्र जल से ही शुद्ध होता है। सोना और चांदी अग्नि और जल के संयोग से उत्पन्नहुए हैं इसलिये उनकी पवित्रता अपनी योनि से ही उत्तम होती है। तांबा, लोहा, कांस, पीतल, जस्ता और सीसा का पात्र, खार-खटाई और जल इनमें जिससे होतके उसी से शुद्ध कर लेना चाहिए। घी, मधु आदि को पिघलाकर छान लेने से, जमे हुए का प्रोक्षण से और लकड़ी के पात्रको छीलने से, शुद्धिहोती है१११-११५॥ मार्जनं यज्ञपात्राणां पाणिना यज्ञकर्मणि। चमसानां ग्रहाणां च शुद्धिःप्रक्षालनेन तु ॥११६॥ चरूणां स्रुक्स्रुवाणां च शुद्धिरुष्णेन वारिणा। स्फ्यशूर्पशकटानां च मुसलोलूखलस्य च ॥११७॥ अद्भिस्तु प्रोक्षणं शौचं बहूनां धान्यवाससाम्। प्रक्षालनेन त्वल्पानामद्भिः शौचं विधीयते ॥ ११८ ॥ चैलवच्चर्मणां शुद्धिर्वैदलानां तथैव च। शाकमूलफलानां च धान्यवच्छुद्धिरिष्यते ॥ ११९॥ कौशेयाविकयो रूषैः कुतपानामरिष्टकैः। श्रीफलैरंशु पट्टानां क्षौमाणां गौरसर्षपैः ॥ १२०॥ क्षौमवच्छङ्खशृङ्गाणामस्थिदन्तमयस्य च। शुद्धिविजानता कार्या गोमूत्रेणोदकेन वा ॥ १२१ ॥