मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[Page Header: पांचवां अध्याय। १७६]
पुरुष, न्याय से मिले धन से शुद्ध हैं वे ही शुद्ध हैं। केवल मिट्टी जल से शुद्ध होनेवाले पवित्र नहीं माने जाते। विद्वान् क्षमा से, यज्ञ आदि न करनेवाले दान से, पापी जप से और वेदविशारद तप से पवित्र होते हैं ॥ १०५-१०७ ॥
मृत्तोयैः शुध्यते शोध्यं नदी वेगेन शुध्यति । रजसा स्त्री मनोदुष्टा संन्यासेन द्विजोत्तमः ॥ १०८ ॥ अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति । विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति ॥ १०६॥ एष शौचस्य वः प्रोक्तः शारीरस्य विनिर्णयः । नानाविधानां द्रव्याणां शुद्धेः शृणुत निर्णयम् ॥११०॥
अपवित्र पदार्थ मिट्टी और जल से शुद्ध होते हैं । नदी वेग से शुद्ध होती है। मन से दूषित स्त्री रजस्वला होने से शुद्ध होती है और ब्राह्मण त्याग से शुद्ध होता है। जल से शरीर शुद्ध होते हैं । मन सत्यभाषण से शुद्ध होता है । इस प्रकार शरीरशुद्धि का निर्णय कहा है अब द्रव्य शुद्धि का निर्णय कहेंगे ॥ १०८-११० ॥
तैजसानां मणीनां च सर्वस्याश्ममयस्य च । भस्मनाद्भिर्मृदाचैव शुद्धिरुक्ता मनीषिभिः ॥ १११ ॥ निर्लेपं काञ्चनं भाण्डमद्भिरेव विशुध्यति । अब्जमश्ममयं चैव रजतं चानुपस्कृतम् ॥ ११२ ॥ अपामग्नेश्च संयोगाद्धैमं रौप्यं च निर्बभौ । तस्मात्तयोः स्वयोन्यैव निर्णेको गुणवत्तरः ॥ ११३ ॥ ताम्रायः कांस्यरैत्यानां त्रपुणः सीसकस्य च । शौचे यथार्हं कर्तव्यं क्षाराम्लोदकवारिभिः ॥ ११४ ॥