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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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१६२ मनुस्मृति । भूस्तृणं शिग्रुकं चैव श्लेष्मान्तकफलानि च ॥ १४ ॥ सदा वेदपाठ में लगा रहे, इन्द्रियाँ वश में रक्खे, सब से मित्रता रक्खे, मनको स्थिर रक्खे, सदा दान देवे, किसीका दान न लेवे और सब प्राणियों पर दयादृष्टि रक्खे । वैतानिक अग्निहोत्र सदा करे, और अमावस—पूर्णिमा को इष्टि भी किया करे । नक्षत्रयाग, चातुर्मास्य, उत्तरायण और दक्षिणायन याग को क्रम से करे । व- सन्त और शरद् ऋतु के मुनि अन्नों को खुद लाकर, विधि से चरु और पुरोडाश बनाकर याग करे । इस पवित्र हवि से देव होम करके, बाक़ी खुद खा लेवै । भूमि और जल में पैदा होनेवाले शाक, पवित्र वृक्षों के फूल, फल, कंद और फलों से निकला तेल आदि खाना । मद्य, मांस, कुकुरमुत्ता, सहँजन, लहसोड़ा वगैरह न खाना ॥ ८-१४ ॥ त्यजेदाश्वयुजे मासि मुन्यन्नं पूर्वसंचितम् । जीर्णानि चैव वासांसि शाकमूलफलानि च ॥ १५ ॥ कुआर के महीना में, पहले इकट्ठा किया हुआ मुनि अन्न को अलग कर दे, नया संग्रह करले और पुराने कपड़े, शाक, कन्द, फल को भी अलग करदेवे ॥ १५ ॥ न फालकृष्टमश्नीयादुत्सृष्टमपि केनचित् । न ग्रामजातान्यार्त्तोऽपि मूलानि च फलानि च ॥ १६ ॥ अग्निपक्काशनो वा स्यात्कालपक्वभुगेव वा । अश्मकुट्टो भवेद्वापि दन्तोलूखलिकोऽपि वा ॥ १७ ॥ सद्यःप्रक्षालको वा स्यान्माससंचयिकोऽपि वा । षण्मासनिचयो वा स्यात्समानिचय एव वा ॥ १८ ॥ नक्तं चान्नं समश्नीयाद्दिवा वाहृत्य शक्तितः । चतुर्थकालिको वा स्यात्स्याद्वाप्यष्टमकालिकः ॥ १९ ॥