मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextछठवां अध्याय। १६३ खेत का अन्न दूसरे का छोड़ा हुआ भी और गाँव का फल, फूल, शाक आदि दुःखी होनेपर भी न खावे। मुनि अन्नों को आग में पकाकर खाय, या ऋतु के पके फल खाय, पत्थर से पीसकर खाय या दांतों से चबाकर खाय। एक दिन के योग्य या एक महीना के या छः महीना के अथवा एक साल के निर्वाह लायक अन्न का संग्रह करे। अन्न लाकर रात या दिन में एकबार भोजन करे या एक दिन उपवास करके दूसरे दिन सायंकाल या तीन दिन उपवास करके चौथे दिन सायंकाल भोजन करे॥ १६-१९॥ चान्द्रायणविधानैर्वा शुक्लकृष्णे च वर्तयेत्। पक्षात्तयोर्वाप्यश्नीयाद्यवागूं कथितां सकृत् ॥ २०॥ पुष्पमूलफलैर्वापि केवलैर्वर्तयेत्सदा । कालपक्कैः स्वयंशीर्णैर्वैखानसमते स्थितः ॥ २१ ॥ भूमौ विपरिवर्तेत तिष्ठेद्वा प्रपदैर्दिनम् । स्थानासनाभ्यां विहरेत्सवनेषूपयन्नपः ॥ २२ ॥ ग्रीष्मे पञ्चतपास्तु स्याद्वर्षास्वभ्रावकाशिकः । आर्द्रवासास्तु हेमन्ते क्रमशो वर्धयंस्तपः ॥ २३ ॥ शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष में चान्द्रायण व्रत की विधि से रहे अथवा पूर्णा और अमा को एक बार उबाली हुई यवागू खाय। अथवा ऋतु में पके और स्वयं गिरे फल, मूल, फूलों से ही नि- र्वाह करे। भूमि पर बैठा रहे या दिनभर पैरों से खड़ा रहे, अपने स्थान और आसन में विहार करे। तीनों काल में स्नान किया करे। गर्मी में पञ्चाग्नि सेवन करे। वर्षा में खुले स्थान में रहे, शीतकाल में गीला कपड़ा धारण करे, इस प्रकार तपस्या को धीरे धीरे बढ़ाता रहे ॥ २०-२३ ॥ उपस्पृशंस्त्रिषवणं पितॄन्देवांच्च तर्पयेत् । २५